🚩 सिरे मंदिर जालोर • जय श्री नाथजी महाराज री हुक्म 🚩

चमत्कार जो मैंने स्वयं देखे - श्री बंशीलाल सोनी

॥ जय श्री शांतिनाथजी महाराज ॥

।। भक्तों की भावांजलि ।।
महाराजजी के चमत्कार जो मैंने स्वयं देखे

- श्री बंशीलालजी सोनी, जालोर
जलन्धरनाथजी की पीठ कणियागिरी पर पीर श्री केशरनाथजी के शिष्य
सिद्ध पुरूष पीर श्री शांतिनाथजी महाराज आसीन हुए । यहां पर मैं इतिहास के पन्नों
में ना जाकर पीर श्री शान्तिनाथजी के साथ गुजरे उनके भव्य चमत्कारों की माला के
कुछ मणके प्रस्तुत कर रहा हूं जिनका मैं प्रत्यक्ष दर्शी हूँ।
आज से लगभग 40 वर्ष पूर्व की बात है जब मेरी उम्र लगभग 12 वर्ष के आस
पास रही होगी। जालोर दुर्ग के पिछे स्थित झरणेश्वर महादेव का प्रसिद्ध मन्दिर है।
सूनसान जगह लेकिन भव्य तपोस्थली। वहां पर सावन मास में त्रयोदशी के दिन
प्रतिवर्ष मेला लगता था। मेरी श्रद्धा बचपन से प्राकृतिक स्थलों के दर्शन की रही । मैं
भी अपने एक मित्र को साथ लेकर झरणेश्वरजी मेले में गया। वहां लगभग 300-350
के आसपास भक्तगण उपस्थित थे। चूंकि मैं झरणेश्वरजी जाता रहता था, अत: वहां
पर बिराजे महात्माओं से मेरी अच्छी पहचान थी। वहां के महात्माजी ने रात्रि को 10.
00 बजे सिरे मन्दिर जाने का आदेश देकर कहा कि -पीरजी श्री शान्तिनाथजी
महाराज को यहां लेकर आना है।
उस वक्त वर्षा भी खूब होती थी, सावन का महीना था, चारों तरफ हरियाली
ही हरियाली, घास-फूस भी बहुत थी,बादल छाये हुए थे, चारों तरफ घोर अन्धकार
था। मेरे पास एक टाॅर्च थी। मेरे साथ दोनों व्यक्ति सिरे मन्दिर का शाॅर्टकट रास्ता
जानते थे जो पगडन्डीनुमा था। हम रात्रि के 11.00 बजे सिरे मन्दिर पहुंचे, वहां भी
भजन कीर्तन हो रहा था। मैंने जाकर बावजी पीरजी शान्तिनाथजी को प्रणाम किया,
वो मुझे डाँटने लगे कि इतनी रात्रि में क्यों आया ? मैंने उत्तर दिया झरणेश्वरजी के
महात्मा के कहने से आपको लेने आया हूँ, और आपको मेरे साथ चलना है। मैंने जब
यह बात कही तो पीरजी झरणेश्वरजी के महात्माजी पर बहुत नाराज हुए कि इस
अन्धेरी रात्रि में तुम्हें यहां भेजना आवश्यक थोडे ही था ।
श्री शान्तिनाथजी महाराज स्वभाव से बहुत ही शान्त एवं दयालु प्रकृति के
महात्मा थे। मैंने साथ चलने का निवेदन किया तो वे तुरन्त रवाना हो गये और उसी
पगडंडी के रास्ते से हम झरणेश्वरजी के लिए रवाना हुए । लेकिन मेरी टाॅर्च बिल्कुल
ही डिस्चार्ज हो गयी थी और प्रकाश नहीं दे रही थी। पीरजी शान्तिनाथजी ने कहा
बन्शीलाल पीछे कैसे रह गया । मैंने कहा बावजी रास्ता नहीं दिख रहा है। टाॅर्च
जवाब दे चुकी है। तो बावजी ने कहा तेरे लिए उजाला कर देता हूँ ।

उनके कहते ही पूरा रास्ता बल्बों की रोशनी से जगमगा गया। जबकि उस
वक्त सिरे मन्दिर पर भी लाईट की व्यवस्था नहीं थी। बिना विद्युत पोल, बिना विद्युत
लाइन के पूरा जंगल बल्बों की रोशनी से जगमगा गया और हम झरणेश्वरजी मन्दिर
पहुंचे। उस वक्त वहां पेट्रोमेक्स (केरोसीन) से रोशनी व्यवस्था होती थी । लेकिन
पीरजी के चमत्कार से वहां रोशनी की सजावट हो गई और पूरे मन्दिर व आसपास
की झाडियों में छोटे-छोटे रंगबिरगें बल्ब एवं बडे बडे बल्ब से पूरा मन्दिर जगमगा
गया । यह मुझे पहला चमत्कार उस दिन देखने को मिला। मैंने बावजी के भक्त श्री
रामदासजी सोनी से इस बात की चर्चा उसी वक्त की, कि यह कैसे सम्भव हुआ तो
उन्होंने मुझे कहा कि तुम अभी बच्चे हो, बावजी की माया को नहीं समझ
सकोगे।
जैसा कि पूर्व में मैने बताया कि श्री रामदासजी पीरजी श्री शान्तिनाथजी के
भक्त होने के साथ-साथ सिरे मन्दिर के कामदार थे। सारा हिसाब किताब वे ही
सम्भालते थे। उनके गले में गांठ हो गयी थी, डाॅक्टरों ने जाँच का लिखा। जांच में
कैन्सर बताया गया । रामदासजी सिरे मन्दिर गये और पीरजी से कैन्सर होने की
बात बतायी। बावजी ने उनके गले की गांठ को हाथ लगाकर देखा और कहा यह तो
कैन्सर नहीं केसर की गांठ है और उनसे कहा जा धूणे में जाकर भबूती लगा ले।
उसके पश्चात उन्हें एक महीने तक सिरे मन्दिर पर ही रखा और रोज सुबह तुलसी
पत्र व भबूती की एक चिमटी पानी के साथ उन्हें पिलाया। एक महीने में उनकी गांठ
बिल्कुल ठीक हो गयी और श्री रामदासजी उसके पश्चात लगभग 20 वर्षों तक
और जीवित रहे। चूंकि रामदासजी मेरे संबंधी थे अत: मैं उनसे अक्सर मिलता रहता
था। कैन्सर की गांठ होने से लेकर ठीक होने तथा उसके पश्चात 20 वर्षों तक
जीवित रहने की पूरी जानकारी मुझे है तथा एक कैन्सर के मरीज का बिना दवाई के
20 वर्ष तक जीवित रहना बावजी पीरजी शान्तिनाथजी की कृपा से ही सम्भव हुआ ।
बात 2007 के चातुर्मास की है जब मैंने बावजी पीरजी श्री शान्तिनाथजी
महाराज से जालोर दुर्ग पर चातुर्मास करने का निवेदन अपनी समिति भक्त प्रहलाद
समिति, के अध्यक्ष की हैसियत से किया । बावजी ने इस शर्त के साथ सहमति दी कि
तुम पूरे चातुर्मास में रोजाना दुर्ग पर अपनी समिति के तमाम सदस्यों के साथ
उपस्थित रहोगे और व्यवस्था सम्भालोगे। मैंने बावजी को विश्वास दिलाया कि
आपके आदेश की पूर्ण पालना होगी। चातुर्मास जालोर दुर्ग पर तय हो गया । हमारी
समिति ने चातुर्मास की तैयारियाँ प्रारम्भ की और सारी व्यवस्था पूर्ण कर अनुमान के
अनुसार लगभग 20 दिन की भोजन सामग्री दुर्ग पर पंहुचाई । लगातार सामान दुर्ग
पर ले जाया जा रहा था। नियत दिवस पर बावजी पीरजी श्री शान्तिनाथजी महाराज
विशाल शोभायात्रा के साथ दुर्ग पर पहुँचे। चातुर्मास के पहले ही दिन लगभग 30 से

35 हजार लोग दुर्ग पर पहुंचे। पीरजी महाराज ने मुझे बुलाया और कहा कि
बंशीलाल ओ मनको रो अतरोभारी रेलो कठाती आयो। इसी बीच भण्डार में से एक
व्यक्ति मुझे ढूंढ़ते हुए बावजी के पास पहुंचा और बावजी के सामने ही कहा कि
भण्डार में सारी सामग्री समाप्त हो गयी है और लोग अभी आ रहें है। भोजन की
व्यवस्था कैसे होगी ? बावजी ने भी इस बात को सुना। बंशीलाल कोईं वात है ? मैंने
कहा बावजी कुछ नहीं आपकी मेहरबानी है। फिर उन्होंने कहा ओ भण्डारी कोईं के
रहीयो है। मैंने कहा मैं भण्डार में जाकर वापस आता हूं।
मैं भण्डार में गया तो वहां सम्पूर्ण सामग्री में से सिर्फ शक्कर, घी व तेल बचे
थे। बाकी सारी सामग्री समाप्त हो चुकी थी। मैं भी चिन्ता में था। बावजी के पास गया
और उनसे हकीकत बताई कि सारा सामान समाप्त हो गया है और बाकी का सामान
दुर्ग के नीचे तलहटी में बने स्टोर में पडा है। सामान ऊपर चढ़ाने में समय लगेगा।
बावजी ने कहा चिन्ता मत कर सामान तो थारे ऊपर रा भण्डार में आयो परो है,
जाईने देखे ने आव। मैने कहा बावजी मैं देख के आया हूँ स्टोर तो खाली है। उन्होंने
कहा पाछो जाईने देख। मैं वापस स्टोर में गया तो स्टोर सभी सामान से खचाखच
भरा था। उस दिन मुझे पीरजी की मेहरबानी से एक बहुत बडा चमत्कार देखने को
मिला । तब से मेरी उनके प्रति श्रद्धा कई गुणा बढ गयी । वह दिन मेरे जीवन का
अहम दिन था।
उसी दिन रात्रि से जब हम पीरजी श्री शान्तिनाथजी के पास बैठे हुए थे तो
उन्होंने मुझे कहा बंशीलाल एक काम कर। मैेंने कहा बावजी आप आदेश करें।
उन्होंने- कहा लाल पोल रे माये जूनो शिववाड़ी जलन्धरनाथजी रो मन्दर है, वो खण्डर
हुओ परो हैै, वणने पासो ठीक करावेन वनावनो है, तू करवा दे। थारी समिति ओ काम
कर सके है। मैंने कहा बावजी चातुर्मास पूर्ण होते ही यह काम शुरू करवा देंगे।
चातुर्मास पूर्ण होते ही बावजी ने फिर मन्दिर निर्माण की बात दोहराई । मैंने
कहा बावजी आप वहां चलकर बताएँ कि कैसे निर्माण करवाना है। बावजी शिववाडी
पधारे, देखा तो मन्दिर पर कचरे का ढेर है, लोगो ने मन्दिर की जमीन पर कब्जा कर
रखा है। पास की प्राचीन बावडी को भी कचरे से भर दिया है। बावजी उस स्थिति को
देखकर दु:खी हुए और कहा किसी से झगडा टंटा किये बिना बची हुई जमीन पर
खण्डहर मन्दिर को पुन: रिपेयर करवा दो। मैंने कहा आप हमारी समिति को
आशीर्वाद दें, हम सभी मिलकर शानदार पूर्ववत ऐतिहासिक मन्दिर बना देंगे।
उनके आशीर्वाद से मन्दिर के आस-पास के कब्जों को लोगो से खाली
करवाया और भव्य मन्दिर निर्माण करवाया, बावडी को खाली कर साफ करवाया और
उसे वापस बन्धवाया ।

बावडी पर लोहे की जाली लगाकर उसे सुरक्षित किया । जिस दिन काम प्रारम्भ
किया उस दिन हमारे पास समिति के बैलेन्स मे एक भी पैसा नहीं था। काम लगभग
चार वर्ष तक चला और कुल चालीस लाख का काम करवाया । किसी से उधार नहीं
लिया, न ही किसी से पैसे मांगे।
बावजी के आशीर्वाद से लोग आकर बिना मांगे निर्माण कार्य के लिए पैसे देने
लगे। बावजी महीने मे एक बार निरीक्षण के लिए आते थे और काम देखकर बहुत
खुश होते थे। एक दिन तो बावजी इतने खुश हुए कि मुझसे कहा बंशीलाल थे तो
अठे स्वर्ग वणा दियो है, अतरा रूपया कठा थी लाया मैं तो थने थोडो काम करावा रो
कहियो थो तो घणो काम किदो परो, कोई स्वर्ग बनायो है, जा थने मारो आशीर्वाद है,
थारी हर जगह जीत वेला, और धार्मिक काम करना छोडजे मत। मैं उस दिन के
आशीर्वाद को आज भी याद करता हूँ और मुझे ऐसा महसूस होता है कि आज भी
पीरजी श्री शान्तिनाथजी महाराज मेरे साथ में है और हर काम जो मैं उनको स्मरण
कर करता हूँ वे सफल होते है। पीरजी श्री शान्तिनाथजी साक्षात शंकर भगवान के
अवतार थे। उन्होंने मृत्यु का वरण नहीं किया, बल्कि समाधिस्थ हुए थे। पूरे देश में ही
नहीं बल्कि पूरे विश्व में उनके भक्तगण उनके समाधिस्थ होने पर बहुत दु:खी हुए।
मैंने अपने अनुभवों को व मैंने जो भी चमत्कार देखे उनका वर्णन
किया है। ऐसे बहुत से चमत्कार कई व्यक्तियों को देखने को मिले है। हम सदा यही
कहते है कि नाथजी की फौज करेगी मौज।

पीर श्री शान्तिनाथजी महाराज की जय ।
पीर श्री शान्तिनाथजी महाराज को बार-बार नमन ।
।। बोलिये श्री झाड़ीरा नाथ री जय।।


स्रोत: “सबके नाथजी” पुस्तक, संस्कृति शोध परिषद्, जालोर। पुस्तक क्रमांक 39।

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