॥ जय श्री शांतिनाथजी महाराज ॥
पावन आशीर्वाद
परम पूज्य महन्त गंगानाथजी महाराज
पीठाधीश, सिरे मंदिर, जालोर
ब्रह्मानंद परम सुखदं केवल ज्ञान मूर्ति ।
द्वन्द्वातीतं गगन सदृशं तत्वमस्यादि लक्ष्यं ।
एकं नित्यं विमल चलं सर्वधि साक्षीभूतं ।
भावातीतं त्रिगुण रहितं सदगुरुं तं नमामि ।।
परम पूज्य गुरुदेव पीर श्री शान्तिनाथजी महाराज को मुझ जैसे शिष्य ही नहीं
अपितु यह पूरा क्षैत्र गुरुवत मानता था । पीरजी एक युग पुरुष अवतारी थे, जो सभी
भक्तों के दिलों पर राज करते थे। आपका ओजस्वी व्यक्तित्व, आपकी मन-मोहक,
मधुर-वाणी, सहज व्यवहार तथा आपकी आशीर्वाद मयी आंखों में करूणा की झलक
एवं प्रेम, भक्त को आकर्षित कर लेता था।
मैं जब गुरु महाराज के चरणों में सात मई 1981 (संवत 2038 वैशाख शुक्ल
चतुर्थी गुरुवार) को उपस्थित हुआ था तब मुझे पीरजी के दर्शन कर अलौकिक
सुखानुभूति हुई । आपके सन्निकट रहने पर मुझे स्वत: ही योग एवं भेख के संस्कारों
की प्रेरणा एवं सत्संग की अध्यात्म ऊर्जा मिलने लगी ।
मुझ पर बावजी ने ऐसा अद्भूत कृपा मय शक्तिपात कर दिया कि उनके
जीवन की प्रायोगिक गीता के अनुभव स्वत: ही मुझे आत्मसात होने लगे। इतना ही
नहीं आप दया एवं करूणा से परिपूर्ण संत हृदय थे। वे स्वयं की अपेक्षा अन्य व्यक्ति
की समस्या एवं कष्टों को देखकर संवेदनशील एवं भावुक हो जाते थे। वस्तुत:
बावजी पर दु:ख कातर थे।
पीरजी की वाणी में सचमुच सत्यता थी, हृदय में अपार ईश्वरीय प्रेम था, मन
में शील का दृढ भाव था, आँखों में अद्भूत करूणा थी, हाथ में प्रतिपल दान और
उनके चरणों में सदैव तीर्थ का वास था।
आपके दर्शन कर प्रत्येक जीव कल्प वृक्ष के समान शीतलता एवं शान्ति का
सुखद अहसास करता था। श्री नाथजी के चमत्कारिक व्यकितत्व की आभा निहार
कर हर व्यक्ति की कामनाएॅ कल्प वृक्ष की भांति पूर्ण हो जाती थी। पीरजी महाराज
सच्चे त्यागी, तपस्वी, निर्मोही, शीलवान सद लक्षणों से युक्त सतगुरु की प्रति मूर्ति
थे।
आप प्रकृति प्रेमी थे पशु, पक्षी, प्राणी मात्र के प्रति दया-भाव, करूणा एवं
सहानुभूति रखते थे। इस क्षेत्र में आपने भक्तों को प्रेरित कर मूक प्राणियों के लिए
गौशाला एवं पक्षियों के चुग्गे हेतु चबूतरों का उचित प्रबन्धन किया ।
जन कल्याण के लिये भी आपने प्याऊ, धर्मशाला, छात्रावास का निर्माण करवाने का
भरपूर प्रयास किया । छोटे-छोटे गाॅवों में भाविकों को प्रेरणा देकर वहाॅ मंदिरों का
नव निर्माण करवाकर उनमें देवताओं को प्रतिष्ठित करवाया ।
योगी चांदनाथजी के अनुसार पीर शान्तिनाथजी चमकते सितारों में एक
दैदीप्यमान नक्षत्र थे। वे ध्रुव तारे की भांति संत समाज में एक अटल नक्षत्र की तरह
सुशोभित थे। पीरजी सचमुच ‘‘ परोपकार पुण्याय’’ के लिए, अन्य जीवों के लिये ही
जीते थे। उनकी दृष्टि समाज तथा व्यक्ति के लिये सदैव सकारात्मक थी।
शास्त्रों में उल्लेख है कि संत और चन्दन का एक ही स्वभाव होता है। चन्दन
की सुगन्ध से पूरा वातावरण सुवासित हो जाता है। इसी तरह पीरजी जैसे संत
महापुरुष अपने गुण एवं संस्कारों से पूरे परिवेश को सुगन्धित कर देते थे। इसी लिए
उनके लिए यह दोहा सार्थक है कि :-
चन्दन उगा भूमि पर, खुशी हुआ बनराय।
धन्य भाग्य है हमारे, कीमत दी बढाय ।
नाथजी महाराज ने संत जीवन में किसी समाज विशेष से न जुडकर हर समाज से
जुड़कर उनके प्रति संवेदनशील होकर समाज की एकता एवं परम्स्पर प्रेम बनाये
रखने जैसे मानवीय मूल्यों की रक्षा करने की शिक्षा दी । गाॅवों में जहाँ आपने नाथजी
के सेवगी क्षेत्र एवं अन्यत्र स्थानों पर चातुर्मास व्रत की उपासना की, वहाॅ मुझे भी
आपकी सन्निधि का सुअवसर मिला । वहाॅ मैंने प्रत्यक्ष अनुभव किया कि आपने
धर्म-रक्षा, संत-सेवा, मानव-सेवा, सनातन-संस्कृति संरक्षण के लिए एवं उन गाॅव
की 36 कौमों की एकता पर बल दिया । आप चातुर्मास करने की सहमति उस गाॅव
विशेष में उस समय ही देते थे जब 36 कौम के सभी समाज, परिवार, कुटुम्ब, एकता
की एक डोर में आ जाते थे। यह सद्विचारों एवं सद्भावों की एक अलग अनुपम तथा
अनुकरणीय मिसाल थी। उन्होंने हम शिष्य-मण्डली एवं संत-महात्माओं को हमेशा
सच्ची साधुताई निभाने का संदेश दिया। वे हमे कहते थे कि तुम ‘‘ तन जोगी’’ बनने
की अपेक्षा ‘‘ मन जोगी’’ बनो। बाहर से साधु दिखने के बजाय भीतर से साधु बनो।
मेरे पूर्व जन्म के संस्कार थे कि मुझे ऐसे समर्थ एवं पूर्ण गुरु मिले जो सब कुछ
होते हुए भी साधारण संत की भांति सहजता से हमारे साथ व्यवहार करते थे। यहाॅ
तक की गुरुदेव दैनिक दिनचर्या में भी, भोजन शयन एवं वार्तालाप में भी कोई पर्दा या
गोपनीयता किसी से नहीं रखते थे। वे हमेशा सहजता से ही रहते थे। पीरजी सभी
लोगों को समान दृष्टि एवं समभाव से देखते थे। स्त्री-पुरुष, गरीब-अमीर आदि में
उनकी दृष्टि से कोई भेद नहीं दिखता था।
इसलिए ऐसे समर्थ गुरु की महिमा का कोई पार नहीं है, न हम अपने मुख से
उनके गुणों का बखान करने में सक्षम है। धर्म ग्रन्थों में भी कहा है कि :-
असित गिरिसमं स्यात कज्जलं सिन्धु पात्रे ।
सुरतरूवर शाखा लेखनी पत्रमुर्वी।
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं ।
तदपि तव गुणानामीश पारं न याति ।। (शिव महिम्न स्त्रोत्)
अन्त: में मैं यही कहूंगा कि -
बार-बार करूॅ विनती, श्री गुरु शान्तिनाथ ।
भव-भव भेला रहीजो, जन्म-जन्म में साथ ।।
गुरुमिले ऐडा मिलजो, जेडा शान्तिनाथ ।
भवजल सुं पार करजो, रखजो सिर पर हाथ ।।
मैं ‘‘ सबके नाथजी’’ शीर्षक पुस्तक सम्पादित करने वाले संपादक मंडल को
साधुवाद देना चाहता हूॅ। परम पूज्य गुरुदेव श्री शान्तिनाथजी जैस महान विभूति के
देवलोकगमन पर महंतो, संतो, भक्तो एवं आम नागरिकों की संवेदनानुभूति संग्रह
कर आपने सराहनीय प्रयास किया हैं।
शुभ आशीर्वाद
सूरत से कीरत बडी, बिन पंख उड पाय ।
सूरत तो जाती रहे, कीरत कबहुं न जाय ।।
।। जय श्री शान्तिनाथजी महाराज।।
स्रोत: “सबके नाथजी” पुस्तक, संस्कृति शोध परिषद्, जालोर। पुस्तक क्रमांक 1।
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