॥ जय श्री शांतिनाथजी महाराज ॥
कथा-2 राह अनेक मंजिल एक
श्री पीरजी श्री शांतिनाथजी महाराज अपने भक्तों के मन की शंकाओं का
समाधान भी इस तरीके से करते थे कि उनकी शंकाओं का पूर्ण समाधान हो जाता था
एवं फिर उस बात पर कभी शंका होना असम्भव था। एक बार सिरे मंदिर पर टी.वी.
पर श्री विष्णु पुराण एवं शिव पुराण दोनों ही धारावाहिक देखने का अवसर प्राप्त
हुआ। विष्णु पुराण में विष्णु द्वारा शिव और ब्रह्मा की उत्पति की बात एवं शिव पुराण
में शिव द्वारा विष्णु एवं फिर विष्णु द्वारा ब्रह्मा की उत्पति की बात दिखाने पर मन में
एक शंका उत्पन्न हुई कि दोनों ही शास्त्र प्रमाणों के आधार पर बनाई धारावाहिक की
बातों में मतभेद क्यों है? केवल मन में शंका हुई संत श्री की नजरों ने मन की शंका
को भांप लिया और पूछ ही लिया कि किस सोच में डूब गया । मन की शंका को गुरु
महाराज के समक्ष अर्ज करने पर उन्होने एक कहानी के माध्यम से बात समझाई
इससे मेरी शंका का समाधान हो गया और मैं पूर्ण रूप से श्रद्धा से गुरु चरणों में
नतमस्तक हो गया।
कहानी इस प्रकार थी। एक बार एक राजा के मन में भगवत प्राप्ति की इच्छा
जागृत हुई । मन में तो इच्छा हुई लेकिन बिना गुरु के रास्ता नहीं सूझ रहा था जिस
रास्ते पर चलकर भगवान तक पहुचा जा सकें।
एक बार उस राज्य की राजधानी में संत का प्रवेश हुआ। सरोवर के किनारे
संत कुछ समय विश्राम के लिये रुके। राजा को जब इत्तला मिली तो राजा तुरन्त संत
के चरणों में गये और अपनी मन की इच्छा संत के सम्मुख बताई। संत महात्मा ने
राजा को अठारह पुस्तकें (अठारह पुराण) देकर कहा कि राजन इनका अध्ययन
करना जिससे तुम्हें ज्ञान की उत्पति होगी और ज्ञान के माध्यम से तुम्हें वो रास्ता मिल
जायेगा। जिस रास्तें की तुम्हारे मन में इच्छा है।
इतना कहकर संत अपने रास्ते पर आगे विचरण के लिये चले गये। राजा ने
उन पुराणों का एक-एक कर अध्ययन शुरू किया तो प्रत्येक पुस्तक में (पुराण में)
प्रत्येक भगवान को बड़ा बताया गया था। जैसे कि विष्णु पुराण में विष्णु भगवान तो
शिव पुराण में शिव भगवान, देवी पुराण में देवी को भगवान बताया गया। इस तरह से
अठारह में अलग-अलग नाम को भगवान बताया जा रहा था। राजा ने विचार किया
कि भगवान तो एक होता होगा। इधर 18-18 भगवान बताये जा रहे है, इससे राजा
को शंका हो गई कि भगवान हैं ही नहीं सिर्फ अपना धन्धा चलाने के लिये भगवान
बतला रहे है। शंका मन में इस कदर घर कर गई कि राजा भगवान प्राप्ति के रास्ते
(मार्ग) से उल्टा नास्तिक बन गया अर्थात उसके मन में भाव आया कि भगवान नाम
की कोई चीज हैै ही नहीं। बारह वर्ष उपरान्त वही संत महात्मा पुन: उसी रास्ते से
चलते हुए उस राजा के राज्य की राजधानी पहुंचे और राजा से मिलकर पूछा कि
राजन भगवान की प्राप्ति का रास्ता मिला या नहीं । तब राजा ने जवाब दिया कि
महाराज भगवान तो एक होता होगा, मैंने ऐसा सोच रखा था लेकिन आप द्वारा दी
गई पुस्तकों (पुराणों) में तो अठारह तरह के भगवान बतलाये गये हैं। इससे मेरा
विश्वास पक्का हो गया कि भगवान हैं ही नहीं । लोग सिर्फ अपना धन्धा चलाने के
लिये ऐसा आडम्बर दिखाते हैं।
राजा की बात सुन लेने के बाद संत महात्मा ने राजा से अपने आगे गंतव्य पर
जाने की आज्ञा मांगी, साथ ही बीच में बह रही नदी के पानी से उस पार तक पहुंचाने
के लिये मदद भी मांगी । राजा ने नदी तट तक संत के साथ में चलकर नाविक को
आदेश दिया कि अपनी नाव में बिठाकर महात्माजी को उस तट तक नदी पार करवा
दें। नाविक ने नाव तट पर लगाकर संत महाराज से बैठने का आग्रह किया तब संत
महात्मा ने उस नाव में कमी गिनाते हुए राजा से कहा कि राजन मैं इस नाव में बैठकर
उस पार उतरने से पूर्व बीच में ही डूब जाऊंगा इतना सुनते ही राजा के आदेश से
दूसरी नाव मंगवाई गई। मगर संत ने फिर डूबने की आशंका जताई ।
तब संत ने तीसरी के बाद चैथी, इस प्रकार अठारह नावे मंगवाई और
अठारवीं नाव में भी कमी बताई तो राजा झल्लाकर बोला कि महात्मा जी इन नावों में
बैठकर लोग रोज ही नदी पार करते हैं तो आप किस तरह से डूब जायेंगे। तब थोडा
रूक कर संत ने राजा से कहा कि राजा जिस तरह से मुझे इसमें से किसी नाव में
बैठकर नदी पार उतरने की बात बता रहे हो उसी तरह से मेरे द्वारा बताए अठारह
शास्त्र का अध्ययन करने के बाद आपको शंका नहीं करके किसी एक के नाम को
स्मरण कर तुम भगवान की प्राप्ति कर भव सागर से पार (मुक्ति प्राप्त) कर सकते हो।
अत: सांराश यह है कि संत (महात्मा) गुरु द्वारा बताये गये किसी एक नाम
भगवान को स्मरण करते रहना चाहिये, एक नाम में अनेक नाम है ‘‘ गुरु वाक्यम सदा
सत्य’’ पर अटल रहकर उसी नाम का श्रद्धा से जाप करते रहना चाहिये। पुन: गुरु
चरणों में वन्दन!
प्रस्तुति -श्री राणसिंह भायल
स्रोत: “सबके नाथजी” पुस्तक, संस्कृति शोध परिषद्, जालोर। पुस्तक क्रमांक 26।
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