🚩 सिरे मंदिर जालोर • जय श्री नाथजी महाराज री हुक्म 🚩

त्वमेव माता च पिता त्वमेव - पूज्य लक्ष्मीनाथजी महाराज

॥ जय श्री शांतिनाथजी महाराज ॥

त्वमेव माता च पिता त्वमेव.......

परम पूज्या लक्ष्मीनाथजी
भैरूनाथजी का अखाडा, जालोर

बात उस समय की है जब मैं घर पर अपनी कुटियाँ में दातवाड़ा में थी। उस
समय मैं सिरे मंदिर आती जाती रहती थी। धनतेरस का दिन था। मैं प्रात: जल्दी
उठकर अपनी गवाड़ी की साफ सफाई करने के बाद निवृत हो माला फेरने चार बजे
बैठ गई। माला फेरते-फेरते मुझे पता ही नहीं चला कब मुझे नींद आ गई, उस नींद
की अवस्था में मुझे दाता की आवाज सुनाई दी । ‘‘लुंगी ऐ लुंगी’’ और इतने में मेरे
गाल पर एक जोरदार चांटा मारा। मैं जागी, इधर-उधर कुटीया के बाहर आकर
देखा, मुझे कोई नजर नहीं आया।
मैं आवाज लगाती रही, ‘‘दाता, दाता! पर कोई नहीं ।’’ इधर मेरे गाल व
हाथ दोनों में जलन हो रही थी । इतने में मुझे स्मरण हुआ कि मैं हमेशा दीपावली पर
दाता के पास दर्शन को जाती हूँ। इस बार घर पर ही हूँ, और उसी दिन वहां से
चलकर जालोर आ गई। उस समय दाता सिरे मंदिर बिराजे थे । मैं वहीं गई और
जैसे ही मुझे अवसर मिला मैने दाता को निवेदन किया कि दाता मेरे साथ आज
प्रभात वेला में ऐसी घटना घटी । दाता मुस्कराए व मुझसे कहा- थारे भाभो आइयो
वई तब मैने कहा- हाँ सा आपतो मारे भाभा ही हो सा । ‘‘ फिर उन्होंने फरमाया
माला फेरते भी कोई नीदं ली जाती है ? माला फेरते ईश्वर भजन करो । आलस्य में
जीवन नहीं गवाना है। आत्म कल्याण के लिए सदैव जागृत रहकर भगवान का
भजन करो ।’’
दाता की हम सब पर बडी कृपा थी वह कृपा सदैव बनी रहे यही प्रार्थना है ।

साभार-दैनिक भास्कर


स्रोत: “सबके नाथजी” पुस्तक, संस्कृति शोध परिषद्, जालोर। पुस्तक क्रमांक 23।

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