॥ जय श्री शांतिनाथजी महाराज ॥
पूज्य शांतिनाथजी महाराज
एक अलौकिक व्यक्तित्व
परम पूज्य शांतिनाथजी महाराज की मर्यादाए एवं उनके विचार हर किसी को
प्रभावित करते रहे। कोई उन्हें राम का स्वरूप कहता तो कोई उन्हें शिव का प्रतीक ।
श्रद्धालुओं के लिए शांतिनाथजी वैसे ही थे जिस रूप में वे उन्हें देखते थे। उनके
व्यक्तित्व में अनेक महत्वपूर्ण विशेषताएँ थी जिनके कारण सभी आकर्षित होते थे।
भगवा पगड़ी - शांतिनाथजी महाराज सिर को पवित्र भगवा वस्त्र से पगडी
स्वरूप में ढककर रखते। उनका यह स्वरूप सभी को आकर्षित करता ।
कानों में कुण्डल - महाराजजी के कानों में कुण्डल बहुत ही सुंदर लगते थे।
इन्हें मुद्रा कहा जाता है । यह नाथ साधुओं की विशेषता होती है। लम्बे लम्बे कुण्डल
पहने शांतिनाथजी हर किसी का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित कर लेते थे।
रुद्राक्ष की माला - उनके गले में रुद्राक्ष की माला सुशोभित थी । बडे-बडे
रुद्राक्ष की मालाएं पहले वे साक्षात शिव जैसे लगते थे। कई बार किसी श्रद्वालु पर
कृपा कर उसे अपनी माला पहना भी देते थे।
गेरूआ चैला - उनके शरीर पर भगवा रंग का चोला हर किसी का मन मोह
लेता । इसके अलावा उन्हें किसी अन्य वेशभूषा में कम ही देखा जाता । एक दंतकथा
के अनुसार पार्वती ने सर्वप्रथम प्रसन्न होकर, अपने रक्त से रंग कर चोला गोरखनाथ
जी को दिया था। तभी से यह गेरूआ रंग योगियो का विशिष्ट रंग बन गया ।
शांत स्वरूप - उनका स्वभाव शांत था। वे शांति से सभी की बात सुनते ।
सभी को हमेशा धैर्य के साथ काम करने की बात कहते । इसलिए लोग आत्मीयता से
उन्हें अपनी समस्या बताते । पीरजी भी उनकी पूरी बात सुनते।
बन गए पीरजी - न केवल हिन्दुओं में बल्कि मुस्लिमों में भी वे समान रूप से
पूजे जाते थे। हिन्दू उन्हें नाथजी कहते तो मुस्लिम पीरजी । महाराजजी भी सभी को
समान रूप से आशीर्वाद देते थे।
मित भाषी संत- पीर शांतिनाथ का शांत स्वरूप ही उनकी सबसे बडी
विशेषता थी। अधिकांशत: वे कम ही बोलते थे और किसी भी विषय पर वे सीधे एवं
सपाट शब्दों में ही बोलते थे।
समय के पाबंद - नाथजी समय के पाबंद थे । उनका कार्यक्रम तय समय पर
शुरू होता । भीड के कारण देरी होती तो वे रथ पर सवार होकर लोगो को आगे
चलते रहने का इशारा कर देते और कोशिश करते ही जहां भी पहुंचना हे समय पर
पहुंच जाए ।
सहज आशीर्वाद - उनका आशीर्वाद सहज था। हर कोई उन तक आसानी से
पहुंच सकता था। हर कोई उनसे बात कर सकता था। कभी ना तो उन्होंने किसी को
रोका ना ही उनके सेवकों ने कोई टोका रोकी की । दूर-दूर से लोग आते, नाथजी
को पूछते पता चलता कि विश्राम कर रहे है तो घंटो तक उनका इंतजार करते और
फिर मिलकर जाते
सरल दर्शन - नाथजी के दर्शन की हर किसी को आतुरता रहती । जहां भी
मौका मिलता लोग उनके दर्शन के लिए पहुंच जाते । बावजी भी सरलता से भक्तों
को दर्शन देते। जब उन्हें पता चलता कि लोग बाहर दर्शन के लिए इंतजार कर रहे
है तो नींद से उठकर आ जाते । शहर से बाहर आते-जाते तो लोगो को देखकर रुक
जाते।
राजनीति से परे - नाथजी राजनीति से दूर ही रहे। यह अलग बात है कि
बडे-बडे नेता उनके भक्तों में शामिल रहे। लेकिन नाथजी ने उन्हें साधारण भक्तों
की तरह ही माना । कभी राजनीति में रूचि नहीं दिखाई। लोग उन्हें आग्रह भी करते
कि वे इस विषय पर चर्चा करे किंतु वे मना कर देते ।
हर दिल अजीज- सब भक्तों की सदैव इच्छा रहती कि महाराज जी उनके
गृहप्रवेश, व्यापारिक प्रतिष्ठान, दुकान के शुभारम्भ, धार्मिक प्रसंग, भजन संध्या
इत्यादि पर पधारें । जब भी उन्हें बुलाया जाता महाराज जी शामिल होते।
समाज सेवा - नाथजी समाज के प्रति भी जिम्मेदारी का भाव रखते।
पौधारोपण हो या बावडियों का संरक्षण, समाज सेवा के सब कार्यो को उनका
प्रोत्साहन मिलता । मूक प्राणियों, विशेषकर गाय के प्रति दयाभाव- श्रद्धाभाव रखते।
नाथजी को जब भी समय मिलता वे पौधे लगाते, गायो का चारा खिलाते और बावडी
का अवलोकन कर सफाई के निर्देश देते ।
आंडबर से दूर - नाथजी जीवनभर आडंबर से दूर रहे। उन्होंने कभी भी
दिखावा नहीं किया । जहां भी रहते, सामान्य बनकर रहते। उनका सरल व्यक्ति्व ही
उनकी पहचान थी अपने शिष्यों से भी वे यही कहते कि सरलता ही जीवन का सबसे
बडा धन है, इसलिए सरल बने रहोगें तो ईश्वर प्राप्ति स्वत: होगी।
(साभार-दैनिक भास्कर, जालोर)
विश्वबन्धु शर्मा, धर्मेन्द्र त्रिवेदी
खुशालसिंह, धर्मेन्द्र रामावत
स्रोत: “सबके नाथजी” पुस्तक, संस्कृति शोध परिषद्, जालोर। पुस्तक क्रमांक 11।
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