🚩 सिरे मंदिर जालोर • जय श्री नाथजी महाराज री हुक्म 🚩

एक अद्भुत महायोगी - श्री खीमसिंह, बागरा

॥ जय श्री शांतिनाथजी महाराज ॥

।। भक्तों की भावांजलि ।।

सिरे मंदिर के सिरमौर एक अद्भूत महायोगी
- श्री खीमसिंह, बागरा

पीर शांतिनाथजी जी के देवलोक प्रस्थान से जो रिक्तता या शून्यता पैदा हुई,
उसको भक्तों ने अपनी भावनाओं से भरने का प्रयास किया है । भावनाओं के इस
पुष्पार्पण की श्रंृखला में एक श्रद्धासुमन इस प्रसंग के जरिये मेरा भी सादर अर्पित है।
यद्यपि पीरजी जैसे साक्षात दिव्यांश महापुरुष के संबंध में कुछ भी लिपिबद्ध करने की
पात्रता मुझ अल्प सक्षम में नहीं है । भावनाओं का समुद्र अन्दर हिलोरे ले रहा है ।
उसकी एकाध बुंद बरबस ही बाहर गिर पड़े तो उस पर मेरा वश नहीं । पीरजी की
महिमा बखान करने को शब्द कम पड़ते हैं। लेखनी छोटी पड़ जाती है। जो महसूस
हुआ उस को लिख नहीं पा रहा हूँ और जो लिखा जा रहा है उसकी धार कमजोर पड़
जाती है। आप पर कुछ लिखना सूरज को दीपक दिखाने समान है।
आपके चमत्कारिक व्यक्तित्व एवं कृतित्व को लेकर अनेक दृष्टांत जनमानस
की जुबान पर प्रचलित हैं । उन सब को एक माला में पिरोकर एक जगह संगृहीत
कर पुस्तकाकार में प्रस्तुत करने का भागीरथी प्रयास भाई श्री संदीप जोशी ने किया
है, वह स्तुत्य है। जोशीजी ने अथक प्रयास कर लोगों के विचार एवं भावनाएँ जो
इधर-उधर बिखरी हुई थी, लिखित में आमंत्रित कर उनको पुस्तक रूप में प्रकट होने
का, संजोने का अवसर उपलब्ध करवाया है, इसके लिए वे बहुत-बहुत बधाई के पात्र
हैं।
01 अक्टूबर 2012 की रात 9 बजे मैं अपने पैतृक गांव बागरा में अपने अभिन्न
मित्र पूरणसिंह राठौड़ के साथ इन्टरनेट पर नाथ सम्प्रदाय से संबंधित महान योगी
गोरक्षनाथजी एवं जालंधरनाथजी से जुड़ी वेबसाइट देख रहा था। यह एक संयोग ही
था कि वेबसाईट पर नाथ सिद्धो से जुडी हुई जानकारी प्राप्त करते-करते हमने
सिरेमंदिर से संबंधित साईट खोली तत्पश्चात पूज्य शांतिनाथ जी का जिक्र आने पर
हम दोनों ने आप श्री पर घंटे भर चर्चा की । यह बात उस रात 9 से 10 बजे के बीच
की है। मैंने आपसे जुडे़ संस्मरण, आपका गम्भीर व्यक्तिव आपके श्रीमुख पर अग्नि
सा तेज, सिंह सा चेहरा और साक्षात शिवस्वरूप पर चर्चा की । मेरे मित्र ने कहा कि
ऐसे संत बिरले ही होते हैं और हमारा यह सौभाग्य है कि ये हमारे दौर में मौजूद हैं
और हम भी इनके समकालीन हैं। बात समाप्त कर रात 11 बजे में घर जाकर सोया
ही था कि मेरे मोबाईल की घंटी बजी । सुमेरसिंहजी धानपुर का फोन था । मनहूस
समाचार मिला ‘‘ दाता स्वर्ग सिधार गये हैं।

उदयपुर के धनाणी हाउस में अंतिम सांस ली, इलाज हेतु पधारे थे जिसकी सपने में
भी कल्पना नहीं की थी वो मनहूस घडी आ गई थी। फूट फूट कर रोने के अलावा
कोई विकल्प नहीं था। उसके कुछ ही समय बाद भाई संदीप जोशी का मार्मिक
एसएमएस आया ‘‘ जालोर हो गया अनाथ नहीं रहे पीर शांतिनाथ । मन को तसल्ली
दे रहा था कि अंतिम क्षणों में आपके दर्शन तो नहीं हुए लेकिन आपकी याद तो आई
आप पर चर्चा तो की, दोनों मित्रों ने उस वक्त आपका स्मरण तो किया । सर्वत्र शोक
की लहर फैल गई कुछ भी नहीं सुझ रहा था। घोर निराशा और अंधेरा नजर आ रहा
था । एक शुन्यता पसरी हुई नजर आ रही थी। फिर मन को सांत्वना दी । ऐसे दिव्य
पुरूष सूक्ष्म स्वरुप में मौजुद रहते है, अमर रहते है । शोक की दु:ख की कोई बात
नहीं और सत्य में आप श्री सूक्ष्म स्वरूप में मौजूद ही है । जन - जन के दिल में है,
जन-जन की जुबान पर है, कण-कण में है। आप के खुब चर्चे है, खुब पर्चे है।
प्रत्येक व्यक्ति का अपना अनुभव है । आपको लेकर हर व्यक्ति के अपने सस्मंरण है
आपसे जुडे हर व्यक्ति आपको अपना खास मानता था।
जिस तरह महारास लीला के दौरान हर गौपी को श्री कृष्ण अपने साथ नृत्य
करते नजर आते थे उसी तरह हर भक्त को पीरजी भी अपने खास नजर आते थे।
यही विशेषता आपको सबका खास बना देती है हर व्यक्ति को यही महसुस होता कि
पीरजी मेरे उपर मेहरबान है, मेरी सेवा से सन्तुष्ट होते है। हर जाति, हर समाज
अपको अपने करीब पाता था। आप समाज के सभी वर्गों में लोकप्रिय थे। छोटे से
लेकर बडे-बड़ों तक सब आपके मुरीद थे। सामान्य जन से लेकर जोधपुर और
सिरोही के पूर्व नरेश सहित सभी लोग आपको समान रूप से मानते थे।
आप में अपार भक्तवात्सलता एवं दान की प्रवृति थी। आपकी दरियादिली के
कई किस्से भक्तों की जुबान पर है। अक्टूबर 1993 की बात है गुलाबी ठंड के दिन थे
आप अखाडे में विराजमान थे। आपने किसी भक्त द्वारा भेंट की गई नई ऊनी कम्बल
ओढ रखी थी । तभी गुजरात से वैष्णोदेवी पैदल यात्रा पर जा रहा एक यात्री आपके
पास आशीर्वाद लेने आया। जब वह वापस जाने लगा तो उससे पूछा ‘‘ सर्दी शुरू हो
गई है वैष्णौदेवी पहुॅंचने में दो माह लगेंगे। ओेढने-बिसाने का क्या प्रबंध है ? भक्त ने
कहा एकाध शाॅल है उससे काम चल जायेगा। नाथजी उसके जबाव से सन्तुष्ट नहीं
हुए और उसी क्षण उन्होंने अपनी ओढी हुई कम्बल उस युवा यात्री को दे दी और वह
गुजराती भक्त मना करता ही रहा गया, चकित रह गया। ऐसे थे नाथजी । ऐसी
दरियादिली के अनेक प्रसंग आपसे जुडे हुए है।
पथमेडा गौशाला में साधनारत महाराज रविन्द्रशरणानंद जी ने भी एक ऐसा
ही प्रसंग सुनाया था कि एक बार वो स्वयं गौ-सेवा के कार्य लिए किसी अभियान पर
निकलने वाले थे। इस कार्य की सफलता के लिए आप पीरजी का आशीर्वाद लेने
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भैरूनाथजी का अखाडा जालोर में पधारे। पीरजी वहाँ विराजमान थे आप आशीर्वाद
लेकर जब विदा होने लगे तो पीरजी ने आपको रोककर अपना पर्स पुरा का पुरा
खाली कर वो सारे रूपये गायों की सेवा के काम के निमित्त भेंट कर दिये और कहा
कि आप गौ सेवा के अभियान में निकले हो यह राशि काम आयेगी। महाराज के मना
करने के बावजूद भी पीरजी ने वो राशि जबरन गौसेवार्थ भेंट कर दी ।
रविन्द्रशरणानंद के अनुसार पर्स में उस समय 18 से 20 हजार रूपये थे। ऐसी
विशाल हृदयता एवं उदार मानिसकता दुर्लभ है।
ऐसे अनेक अवसर आए जब आप अत्यन्त कीमती वस्तुएं, यथा कम्बल, शाॅल,
सोने-चांदी की चैन, मालाएँ , रोकड़ राशि आकस्मिक रूप से जरूरतमंद एवं पात्र
को उसके हितार्थ प्रदान कर देते थे। यही दानशीलता एवं विशाल सहृदयता ही आप
को विलक्षणता प्रदान करती है।
आपकी एक और अद्वितीय विशेषता थी कि किसी पात्र को कुछ आर्थिक
सहयोग देना हो और आसपास उपस्थित लोगों का पता भी न चले तो देने का तरीका
भी बडा नायाब और अनूठा अपनाते थे जो आपका अपना ईजाद किया हुआ होता
था। ऐसा तरीका मैंने अपने जीवन में अन्यत्र नहीं देखा। आप 1000 रुपये या 500
रुपये के बड़े नोट को अपने हाथ से लपेटकर गुपचुप तरीके से उसका पतला रोल
बना देते थे । फिर उस पर 10 या 20 रूपये का छोटा नोट लपेट लेते थे ताकि बडा
नोट दृष्टिगोचर नहीं हो । तत्पश्चात उस नोट को स्वयं या किसी के मार्फत दान कर
देते थे। पाने वाला व्यक्ति बाद में जब नोट खोलकर देखता तो उसकी खुशी एवं
आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहता था । ऐसे व्यक्ति आपको कैेसे भूल सकते है ? होली,
दिवाली, वार-त्यौहारों पर आप, पात्र व्यक्तियों को इसी अंदाज में उपहार देते रहते
थे । यह आपके व्यक्तित्त्व की एक विलक्षण खूबी थी।
आपको भक्तों द्वारा जो धन समर्पित किया जाता था, उसका आपने बेहतर
प्रबंधन एवं सदुपयोग किया है। उसमें से एक रुपया भी आपने निजी सुख सुविधार्थ
भोग नहीं किया । धन का उपयोग आपने सिरे मंदिर पर एवं भैरुनाथजी के अखाड़े
के विकास कार्यों पर, गौे शालाओं के संचालन एवं अनुदान पर, सन्त महात्माओं को
भेंट पूजा एवं पात्र श्रद्धालुओं को दान देने पर, मंदिरों के जिर्णोद्धार, सिरे मंदिर तक
सड़क एवं रपट निर्माण, भोजनशाला, जलप्रबंध, भण्डारा, महायज्ञों के आयोजन,
धार्मिक अनुष्ठान, शिक्षण संस्थाओं, अनाथ आश्रमों को आर्थिक सहायतार्थ जैसे
पुण्य-कार्यो पर खर्च किया।
आपका मानना था कि मैं जिस जिस पर भी खर्च कर रहा हूँ वो सभी मेरे
मांगते है। समस्त जीवन के एक एक पल का सदुपयोग-भगवद स्मरण में किया ।
आपका मानना था कि मौज मस्ती और सांसारिक सुखोपभोग तो गृहस्थ जीवन मेंं भी

मिल सकता था। इसमें संन्यासी जीवन का दुरूपयोग क्यों किया जाए ? और
संन्यासी जीवन को सार्थक बनाने के लिए प्रतिपल सतर्क रहे, पलपल भगवद भक्ति
को समर्पित रहे। आप में संवेदन शीलता इतनी थी कि आपने गरीब के घर की छाछ
राबड़ी और अमीर के घर के छप्पन भोग मे सदैव समदृष्टि रखते हुए दोनों का
आतिथ्य समान रूप से स्वीकार किया। हर वर्ग, हर जाति, हर परिवार जहाँ जहाँ भी
आप पधारे, मंत्र मुग्ध हो जाता था। प्रत्येक शख्स को ऐसा लगता था जैसे कि आप
उसके खास हो आप हर परिवार की खैर खबर लेते थे, बडे बुजुर्गों की कुशल-क्षेम
पूछते थे। प्रत्येक व्यक्ति से व्यक्तिगत परिचय पूछना, उसका नाम पता पूछना
आपकी विशेषता थी। आपकी विचारशीलता, संवेदनशीलता और विशाल हृदयता के
कई दृष्टांत है।
किसी गाँव में जब कोई आयोजन या धार्मिक अनुष्ठान होता था और वहां के
लोग जब आपको आमंत्रित करने आते थे तो आपका सबसे पहला सवाल उनसे यही
होता था कि पूरा गाँव आपस में एक है या नहीं ? उस गांव में कोई फूट या आपसी
मनमुटाव होता था तो आप पहले उसे दूर करने की सलाह देते थे। किसी गांव में ऐसे
ही एक धार्मिक आयोजन का अवसर था। उस गांव के समस्त लोगों ने वहां की एक
जाति विशेष के लोगों को गांव से बहिष्कृत कर रखा था, गांव वालो ने यह बात
छुपाते हुए पीरजी को वहां आमंत्रित किया । पीरजी वहां पधारे और भोजन प्रसाद का
समय हुआ। उस जाति विशेष के लोगों को एक तरफ दूर खड़ा देख आप वस्तु
स्थिति भाँप गये। जब आपके भोजन प्रसादी का प्रबन्ध होने लगा तो आपने मना कर
दिया और गाँव वालों से कहा कि मैं तभी भोजन करूंगा जब आप मुझसे पहले उस
जाति वालों को भोजन कराओगे जिनको आपने बहिष्कृत कर रखा है। गांव वाले
शर्मिंदा हो गये और उस बहिष्कृत जाति को वापस गांव में शामिल कर लिया गया।
ऐसे कई विवाद, आपसी कलह, पारिवारिक जमीन जायदाद के मामले आपकी
उपस्थिति मात्र या इशारे में सुलझे हैं।
लोगो को एक करने की, मेलमिलाप व आपस में समन्वय करवाने की आपकी
अनूठी शैली थी । आपकी इसी खूबी के कारण कई गाँवों में विकास हुआ, मनमुटाव
दूर हुए, मंदिरों की प्रतिष्ठा सम्पन्न हुई एवं कई गाँवो में चातुर्मास सम्पन्न हुए।
आपके चातुर्मास गाँवों में सौहार्द्र प्रेम, भाईचारा बढाने एवं आध्यात्मिक वातावरण का
निर्माण करने में सहायक हुए। जमीन जायदाद संबंधी विवाद, ओरण-गोचर के
अतिक्रमण संबंधी विवाद, खेतों के रास्ते, और दो समुदायों के झगडे संबंधी जो विवाद
पुलिस थानों, कोर्ट कचहरी या प्रशासन नहीं सुलझा पाया, ऐसे जटिल विवाद
आपकी उस गांव में उपस्थिति या आभामण्डल की छाया मात्र से चुटकियों में हल हो
गये । क्षेत्र में कानून और व्यवस्था, मर्यादा कायम रखने में भी आपके चमत्कारिक

व्यक्तित्व का सराहनीय योगदान रहा है। आपकी बदौलत ही कई द्वेष समाप्त होकर
लोगों के दिल आपस में मिले हैं। क्षेत्र में शांति, सौहार्द्र, खुशहाली, भाईचारा एवं
प्रेमभाव का वातावरण तैयार करने में आपका व्यक्तित्त्व मददगार साबित हुआ ।
विकासपुरुष के रूप में भी आप श्री चिरस्मरणीय रहेंगे। कई मंदिर,
धर्मशालाएँ भवन आपने बनवाये हैं या आपकी प्रेरणा से बने हैं। कई मंदिर निर्माण में
आपका मार्गदर्शन रहा है।पगलियों (तलहटी) से सिरे मंदिर तक का दुरूह चढाव
आपकी सूझबूझ एवं मार्गदर्शन में ही एक सरल रपट एवं सुलभ सड़क मार्ग का रूप
ले सका है। आप में पहाड़ों को तराशकर मैदान या पगडण्डी बनाने या गुफा को
मंदिर रूप में बदलने की सूझबूझ व अच्छी समझ थी।
साधुओं का समागम हो या कोई धार्मिक आयोजन सभी जगह आपकी
उपस्थिति बडी आकर्षक और मनमोहक लगती थी। तारों के बीच चन्द्र सा दृश्य
नजर आता है। आपके उपस्थिति के बगैर कोई भी आयोजन फीका लगता था । क्षेत्र
का प्रत्येक धार्मिक आयोजन आपकी पावन निश्रा मेंं आपकी छत्रछाया में सम्पन्न
होता था। आपका आभामण्डल इतना प्रभावी था कि घण्टों तक आपके सानिध्य में
बैठने की इच्छा होती थी। आपके दर्शन लाभ से इतना आत्म सन्तोष व अलौकिक
शांति मिलती थी जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता । आपकी उपस्थिति से
मनोरम नैसर्गिक स्वर्गीय वातावरण का निर्माण हो जाता था। जहाँ घण्टों तक बैठकर
चित्त शांत, पवित्र और निर्मल हो जाता था।
यह भी एक अद्भुत संयोग रहा है कि आपने कभी भी मंचों से (लाउडस्पीकर)
पर बोलकर उपदेश नहीं दिये, धर्मसभाओं को संबोधित नहीं किया। माइक के जरिये
उपदेश देने का आपको कभी शौक नहीं रहा । आपका मौन इतना प्रभावी था कि कुछ
भी बोले बिना सब कुछ कह जाता था। वाणी से भी ज्यादा मुखर आपका मौन रहा ।
आपने अपने भक्तों को अपने आचरण के जरिये उपदेश दिये ।
आपका आचरण, आपका जीवन, आपका व्यक्तित्व एवं कृतित्व साक्षात्
बोलता है। जो किसी पुस्तक से कम नहीं है। आप रात मे फुर्सत के क्षणों में अपने
भक्तों के साथ ज्ञान चर्चा करते थे। इन चर्चाओं में अनेक जीवनोपयोगी बातें
निकलकर भक्तों का जीवन सफल बना गई। इन चर्चाओं के माध्यम से आपने अपने
भक्तों को मर्यादा पालन एवं श्रेष्ठ नैतिक आचरण अपनाने को प्रेरित किया। आपने
पितृतृप्ति एवं श्राद्ध-तर्पण पर भी जोर दिया । अपने पितृों की तृप्ति से घर परिवार में
सुख समृद्धि एवं खुशहाली आती है। पितृदोष हेतु भाई, बन्धु, कुटुम्बियों के साथ
सद्भाव एवं प्रेमभाव का व्यवहार करने एवं बहन बेटियों को खुश रखने की बात कहते
थे। माता-पिता की सेवा के लिए प्रेरित करने का आपका अपना तरीका था।
आपके सानिध्य में आते ही चित प्रसन्न हो जाता था। सिरे मंदिर पर रात को

जब आप धूणा लगाकर तापते और भक्त जन आसपास बैठते तो बडा ही मनोरम
दृश्य उपस्थित होता था। वहाँ से उठकर जाने का मन नहीं करता था। देर रात तक
आपके पास बैठकर आपके दर्शन की, आपके श्रीमुख से प्रतिपल कुछ नया सुनने की
लालसा रहती थी । अंत में आप ही अपने भक्तों को सो जाने का आदेश फरमाते, तब
ही भक्त जाकर सो जाते थे।
आपके आभामण्डल का, आपके तप का दूर-दूर तक प्रभाव था। गाँवों में
लोग आपके आगमन की खबर मात्र से आपसी वैर-भाव भुलाकर आपके स्वागतार्थ
एक हो जाते थे।
आप लोक कला, लोक परम्परा एवं संस्कृति के भी मर्मज्ञ थे। क्षेत्र के
रीतिरिवाजों एवं परम्पराओं को संजोकर रखने एवं निभाने के हिमायती थे। एक
प्राचीन बैलगाडी का दुर्लभ माॅडल बनवाकर आपने सिरे मंदिर पर भावी पीढ़ियों के
अवलोकनार्थ रखा है। आपको प्राचीन परम्पराओं, रीति रिवाजों, त्यौहारों एवं संस्कृति
का उच्च कोटि का ज्ञान था । इन विषयो पर आपने अपने भक्तजनों का शानदार
ज्ञानवर्धन किया है।
आपको पुराने भजनों का, स्थापत्य का व शिल्प का भी शौक था। अच्छे से
अच्छे ख्यातिप्राप्त भजन कलाकारों, स्थापत्य के जानकार कारीगरों, विद्वानों,
पंडितों की परखकर समय-समय पर सिरे मंदिर पर आमंत्रित किया, सम्मानित किया
एवं उनकी सेवाये ली हैं। प्रतिभाएं आपसे आदर पाती थी। प्रोत्साहन पाती थी।
आपने, आपके द्वार तक पहुँचे जरूरत मंद व्यक्ति को खाली हाथ नहीं लौटाया ।
भक्तों के निवेदन को कभी नहीं ठुकराया। हर दिल अजीज रहकर सभी को साधने
का आजीवन प्रयास किया। आपके दरबार में आया हर श्रद्धालु, संत महात्मा,
तलबगार पूर्ण तृप्त होकर ही लौटा। सभी को सहज सुलभ होकर दर्शनलाभ देकर
दिव्य आनन्द की अनुभूति प्रदान की ।
आप में सूझबूझ एवं दूसरों की परवाह की ज्यादा भावना थी आप एक साथ
कई चीज़ों पर नजर रखते थे। अखाडे़ में विराजते हुए भी सिरेमंदिर, गौशालाओ,
धर्मशालाओं, साधुसंतों, ग्रामीणों, मवेशियों सबके हाल-चाल का ख्याल रखते थे।
विभिन्न मठ मंदिरों की स्थिति, वहाँ के महात्माओं का ख्याल रखते थे। क्षेत्र मंदिरो
का निर्माण आपके मार्गदर्शन में धार्मिक जलसो या मेलों में, जुलूसों में व्यवस्था देखने
की शैली आपकी बडी अनूठी थी। एक हाथ को ललाट पर रखकर पैनी दृष्टि से इस
प्रकार सिंहावलोकन करते जैसे कोई शेर जंगल को निहार रहा है। आप दूर-दूर
तक अपनी चिरपरिचित शैली से नजरे घूमाते कि कहीं कोई कसर तो नहीं है।
सिहांवलोकन की आपकी भाव भंगिमा, मुखमुद्रा का दृश्य देखते ही बनता था। इस
अदा का हर कोई कायल था । जुलूसों में उमड़ती अत्यधिक भीड़भाड़ या मेलों में

कुछ गडबड न हो जाये, शरारती तत्वों की करतूतें न हो जायें, इस की प्रतिपल
आपको जिम्मेदारी व चिंता रहती। आप सिरे मंदिर पर हों या अखाडे़ में, रात को
हमेशा दो-तीन चक्कर पूरे परिसर में निगरानी की खातिर लगाने की जीवन भर
आपकी आदत रही थी। आपकी चैकसी पूर्ण नज़रें प्रतिक्षण चारों और दौड़ती रहती
थी।
लोगों को परोपकारिता और दानशीलता की ओर प्रेरित करने का भी आपका
अनूठा तरीका था । जब भी कोई भाविक अपने प्रतिष्ठान, दुकान या व्यवसाय के
उद्घाटन के लिए आपसे निवेदन करने आता तब आप उसकी हैसियत देख फरमाते
थे कि कभी दान, पुण्य सत्संग या धर्म के कार्य के उद्घाटन के लिए भी तो मुझे
बुलाया करो । केवल अपने मतलब के लिए नहीं।
आपकी इस साफगोई एवं स्पष्ट वादिता का महज एक पवित्र उदेश्य होता
था। लोक व्यवहार एवं मर्यादा बनाये रखते हुए आपने लोगों को धर्मकार्य एवं
परोपकार के मार्ग पर चलने हेतु प्रेरित किया ।
सभी भक्तों के प्रति आपकी समदृष्टि थी। हर व्यक्ति आपको अपना मानता
था और आप भी हर व्यक्ति को अपना मानते थे। जब कभी किसी ने लोक मर्यादा से
हटकर आपसे ज्यादा अंतरंगता बढाने की कोशिश की तब आपने कड़े शब्दों में
कहा-हम अपने माता-पिता ,कुटुम्बपरिवार, सगे संबंधियों को छोड़कर आये हैं
जिनसे बढकर दुनिया में कोई नहीं होता है। अब हम किसी के सगे नहीं हैं । वैसे हम
सब के हैं और यूं किसी के नहीं हैं । हम संत हैं, सबके हैं। इस ध्येय को आपने जीवन
भर निभाया ।
आप सदैव दुनियादारी, जातिपाति, राजनीति से ऊपर उठकर रहे, विरक्त
रहे। आपका किसी व्यक्ति विशेष या जाति के प्रति लगाव नहीं रहा और समान रुप
से सभी भक्तों को अपना वात्सल्य, प्रेम, करुणा रूपी प्रसाद जीवन भर बाँटते रहे।
आपने हमेशा मर्यादा को बढ़ाने वाली, इतिहास को समृद्ध करने वाली, परोपकार को
प्रोत्साहन देने वाली और सनातन धर्म को सशक्त करने वाली गतिविधियों,
क्रियाकलापों को प्रोत्साहन दिया। इन दैवी कार्यों में एवं सांस्कृतिक उत्थान में प्रवृत्त
लोगों का सदैव उत्साहन वर्धन किया और आशीर्वाद दिया। आपका एक एक पल
भगवद भक्ति को समर्पित रहा ।
आप सदा शान्त, धीर गम्भीर मौन, योगमुद्रा में मस्त रहे। संत समागम
धार्मिक जलसों या समारोहों में आपकी योगनिद्रा की मुद्रा दृष्टिगोचर होती थी। लोग
समझते थे आप नींद की झपकी ले रहे हैं। ये आपकी अनुपम प्रभु स्मरण की शैली,
भीड के बीच रहकर भी एकांत सेवन का यह आपका अनूठा तरीका बड़ा ही रहस्यमय
व अद्भुत था।

जोधपुर के पूर्व नरेश गजसिंहजी ने आपको न केवल जालोर का बल्कि पूरे राजस्थान
में अपनी अलग पहचान रचाने वाला बिरला और महान संत बताया है। आपके
सद्विचारों, उच्च कोटि की सीख को इंसान का जन्म सार्थक करने में कारगर सिद्ध
होने वाला बताया है।
प्रख्यात जैन संत रूपमुनि महाराज ने आपको देवसभा शुभोभित करने वाला
संत बताया। जैन समाज के प्रख्यात राष्ट्र संत जयंतसेन सूरीजी महाराज जो कि
आपके ब्रह्मलीन होने के समय सायला में चातुर्मास कर रहे थे, ने आपको सभी धर्मों में
स्वीकार्य बिरला संत होना बताया हैं।
प्रतिपल स्मरणीय, संध्यावंदनीय, राज राजेश्वर, मरूधरानाथ, संत शिरोमणी
अनंत कोटि जन के श्रद्धाबिन्दु, युगदृष्टा, हिन्दूहृदय सम्राट, सर्वधर्म समभाव के
प्रतीक, भक्तवत्सल, करुणासागर, निर्मलचित्त, सनातन धर्म के ध्वजवाहक, महाकुंभ
मेले के न्यौतनहार, सतोवृत्ति के स्त्रोत, सिरे मंदिर के सिरमौर, सैंकड़ों मंदिरो के
निर्माता, जीर्णोद्धारक एवं प्राण प्रतिष्ठापक, सैंकड़ों कुओं, बावड़ियों, जलाशयों के
जीर्णोद्धारक, गौशालाओं के प्रणेता एवं संचालक, माता-पिता, गाय, गुरु एवं कमजोर
प्राणियों की सेवा के हिमायती। धीर गम्भीर, योगमुद्रा के धनी, चमत्कारिक
आभामण्डल के धनी, प्रकृति एवं पर्यावरण प्रेमी, प्राणीमात्र हितार्थ ऐतिहासिक महारुद्र
एवं विष्णुमहायज्ञ आदि अनेकानेक यज्ञों के आयोजक, बत्तीस चार्तुमास तपस्यारत,
शिव स्वरूप, महासिद्ध जलंधरनाथजी की प्रतिमूर्ति, सांख्य एवं कर्मयोग का जीवंत
उदाहरण, महान योगीराज गोरखनाथ जी एवम महान सिद्ध जालंधरनाथजी की अति
प्राचीन परम्परा के संवाहक, अखिल भारतीय महान नाथपीठ सिरेमंदिर के
पीठााधीश्वर गुरू केशरनाथजी के श्रेष्ठ शिष्यरत्न, पिता श्री रावतसिंहजी जोरावत
एवं माता श्री सणागर कंवर के योग्य पुत्र रत्न, मर्यादा प्रेमी, राठौड़ कुलभूषण
युगपुरुष एवं आध्यात्मिक जगत के चमकते सितारे एवं सिरे मंदिर जालोर की
बुलन्दियों को चरम सीमा तक पहुँचाने वाले श्रेष्ठ महापुरुष के रूप में ब्रह्मलीन पूज्य
पीर शांतिनाथ सदैव अमर रहें।

नाथजी महाराजजी की जय ।


स्रोत: “सबके नाथजी” पुस्तक, संस्कृति शोध परिषद्, जालोर। पुस्तक क्रमांक 38।

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