॥ जय श्री शांतिनाथजी महाराज ॥
भजन
प्रणाम हमारा कह देना....
किशोर भारती
आलासन
इक जाने वाले गुरुवर को, प्रणाम हमारा कह देना ।
प्रणाम हमारा कह देना, आदेश हमारा कह देना ।
उस जाने वाले पीर को, प्रणाम हमारा कह देना ।
इस जाने वाले जोगी को, आदेश हमारा कह देना ।
गांव भागली धन्य हुआ था, राठौड़ कुल में अवतार लिया था
इस राठौड़ कुल के दीपक को, प्रणाम हमारा कह देना ।
धन्य सिणगार कंवर माता थी, धन्य पिता रावतजी थे।
गुरु केशर नाथजी के लाल को, प्रणाम हमारा कह देना ।
जैसा आपका नाम था, वैसे ही गुणवान थे।
शान्तिनाथजी विष्णु रुप को, प्रणाम हमारा कह देना ।
जगवन्दन जगदीश थे, जन-जन के परमईश थे।
इस ब्रह्म निष्ठ ब्रह्म रूप को, प्रणाम हमारा कह देना ।
संतों में सिरमौर थे, भक्तोंं के चित्त चोर थे।
इस शिव अवतार श्री कृष्ण को, प्रणाम हमारा कह देना ।
महारूद्र जब जगन हुआ था, बाव कुएॅ जल खूँट गया था।
मेले के मान रखैया को, प्रणाम हमारा कह देना ।
कुम्भ मेले जिमाऐ थे, साधु संत सब हरषाये थे।
संत सेवक श्री पीर को, प्रणाम हमारा कह देना ।
सिरे मन्दिर का श्रृंगार सजाया था, गांव-गांव मन्दिर बनाये थे।
संत भेख विश्वकर्मा को, प्रणाम हमारा कह देना ।
मेवाड़ से सन्देशा आया था, मारवाड़ को हिलाया था।
उस वीर भौम में पोड़ने वाले को, प्रणाम हमारा कह देना ।
पद्मासन पीर ने पुरा था, नैनो से ध्यान लगाया था।
भक्तों के भ्रम मिटाने को, प्रणाम हमारा कह देना।
स्रोत: “सबके नाथजी” पुस्तक, संस्कृति शोध परिषद्, जालोर। पुस्तक क्रमांक 33।
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