॥ जय श्री शांतिनाथजी महाराज ॥
जीवन परिचय
वही पे्ररणा पुंज हमारे.........
वीर वीरमदेव सोनगरा की कर्मभूमि, महर्षि जाबालि एवं महासिद्ध
जलंधरनाथजी की तपोस्थली, स्वर्णगिरी एवं कणियागिरी पर्वत की तलहटी और
जवाई नदी के तट पर बसे मरुभूमि जालोर के ऐतिहासिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक
एवं आध्यात्मिक वैभव को पीर शांतिनाथ के रूप में प्रकट हुए दैदीप्यमान नक्षत्र ने
अपने तप, साधना, व्यक्ति्व, कृतित्व और चमत्कारों से ऊचाईयों की नई बुलंदियो तक
पहुँचाया है । आपके बारे में कहा जाता है-
जालोरी में इण भांति तपिया, कणियागिरी के सिर ।
धन्य-धन्य शांतिनाथजी आप कैवाया जालोरी पीर ।।
जालोर की धरती का यह सौभाग्य था कि आप यहाँ अवतरित हुए। ये
पूण्यभूमि भी बडी गौरवमयी है इसके लिये कहा जाता है-
जाल-जाल जळमै जठै सूर सती सिरमौर।
दीजो म्हाँनै देवता जनम भौम जालोर ।।
संत, सती और सूरमाआें की इस धरती पर आप भागली सिन्धलान नामक गाँव में
अवतरित हुए। जालोर जिला मुख्यालय से 12 किलोमीटर दूर इस गांव के एक
साधारण परिवार में आपका जन्म हुआ। जोरावत राठौड़ परिवार में आप श्री का जन्म
विक्रम संवत 1996 माघ कृष्णा पंचमी सोमवार को प्रात: ब्रह्म मुहूर्त में 3 बजकर 30
मिनट पर हुआ था। आपके पिताजी का नाम रावतसिंहजी जोरावत एवं माताजी का
नाम श्रीमती सिणगार कँवर था। आपके तीन भाई थे मंगलसिंहजी, बहादुरसिंहजी
एवं साँकलसिंहजी। आप भाइयों में सबसे छोटे थे । आपके बचपन का नाम ओटसिंह
था। गुरु केसरनाथजी की इच्छा पर आपकी दीक्षा हुई । आपकी औपचारिक शिक्षा
नहीं हुई थी। आप कभी स्कूल नहीं गये । आपके ही पैतृक गांव भागली सिन्धलान मे
केसरनाथजी महाराज धूणे पर रहते थे। आप वहांँ बचपन से आते-जाते रहते थे।
आपका उनके प्रति लगाव था। उनके पास 5-7 गायें थी। आप उनकी गायों की भी
सेवा करते थे। कई बार आप अपने घर से दूध का लोटा भरकर गुरु को पिलाने जाते
थे। छोटे होने के कारण आपकी माताजी भी आपको कई बार लेने और पहुँचाने आती
थी। गुरु के प्रति लगाव एवं भक्ति में रुचि देखकर आपके परिवार वालो ने भी आपको
गुरु सेवा में प्रस्तुत करने की इच्छा व्यक्त की । अनुकूल समय और संयोग पर आप
7-8 वर्ष की कोमल आयु में ही गुरु सेवा मेंं आ गये थे। जालोर आकर आपने शहर
के एक निजी विद्यालय में वीरमारामजी राजपुरोहित के पास साक्षर होने तक की
शिक्षा प्राप्त की । वीरमारामजी राजेन्द्र नगर में (झूपों में) रहते थे। छ: माह तक
साक्षरता की शिक्षा प्राप्त कर आप पढना लिखना सीख गये थे। आपका ननिहाल
बागरा में सोलंकी परिवार में था।
कहते है कि पूत के पाँव पालने में ही दिख जाते हैं। होनहार बीरवान के होत
चीकने पात । जो उम्र खाने पीने की और मौजमस्ती की होती है, उस बचपन के दौर
में भी आप चिन्तन मनन में धीर-गंभीर होकर गुरु-भक्ति में लीन रहते थे। दिव्य कर्म
में लग गये। औपचारिक रूप से पूज्य केसरनाथजी ने विक्रम संवत 2011 कार्तिक
शुक्ल पंचमी को सोमवार सायं 4 बजे सिरे मंदिर पर आपको शिष्यत्त्व दिया। सिरे
मंदिर के पीठाधीश्वर एवं महंत के रूप में आपका गादी तिलक विक्रम संवत 2025
चैत्र शुक्ला सप्तमी, सोमवार के दिन हुआ था।
इसके बाद संन्यास पथ पर इस कदर आगे बढे़ कि कभी पीछे मुुडकर नहीं
देखा तथा एक से बढकर एक ऐसी परम्पराएँ स्थापित की, ऐसे चमत्कारिक कृत्य
किये जिनसे पूरा संत समुदाय गौरवान्वित हो गया । आपकी मर्यादाएँ, आपके विचार,
आपका व्यक्तित्व, आपका आभामण्डल हर किसी को प्रेरित करता रहा। आप साक्षात्
शिवस्वरूप बन गये। आपका अवतरण जीव को माया के बंधन से मुक्त करके
ब्रह्मदर्शन कराने, आत्म साक्षात्कार कराने और जीव मात्र को परम सुख शांति प्रदान
करने के लिए हुआ था और प्राणीमात्र के हितार्थ आपका जीवन विस्तीर्ण रहा । आप
श्रद्धालुओं को उसी रूप में नजर आते थे जिस रूप में वे आपको देखते थे। आपके
व्यक्ति्व की सैंकड़ों खूबियां जनमानस को आकर्षित करती रही । आपका दिव्य तथा
सुंदर रूप, कानों में कुण्डल, भगवा वेश, गले में रुद्राक्ष की माला, सुंदर मुखमुद्रा, और
शांत स्वरूप बरबस ही हर किसी का मन मोह लेता था। एक बार आपके चेहरे के तेज
को देखकर कोई भी आपकी ओर आकर्षित हुए बिना नहीं रहता था। आपकी
गुरु-गंभीर योगमुद्रा, मधुर वाणी, सहज आशीर्वाद, समय की पाबंदी, राजनीति और
जातिपाँति से परे, हर दिल अजीज, परोपकारिता, आडम्बर से दूर, मर्यादा प्रेम, सरल
दर्शन एवं भक्त वात्सल्य जैसी विशेषताओं से हर कोई प्रभावित था । आप जब शहर
में निकलते थे तो सडक के दोनों ओर हाथ जोडें़ खडे लोग आपके दर्शन की एक
झलक पाने को बेताब हो जाते थे। वह मनोरम दृश्य बडा सकूनदायक होता था।
जालोर जिले की जनता ही नहीं, पीरजी के चमत्कारों से गुजरात, महाराष्ट्र,
कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, पंजाब तथा हरियाणा में रहने
वाले श्रद्धालु भी भलिभांति परिचित थे। एक के बाद एक पीरजी ने अपने जीवनकाल
में ऐसे कई कार्य किये, जो किन्ही चमत्कारों से कम नहीं थे । आज भी उनके
चमत्कारों एवं सरल स्वभाव का बखान करते भक्त नहीं थकते । आम जन में आज भी
यह धारणा है कि पीरजी का नाम लेकर शुरु किया गया कार्य कभी भी निष्फल नहीं
होता। सदियों तक जनता उनके चमत्कारों और कृत्यों को याद रखेगी।
आपका जीवन बहुआयामी था। आपको बचपन से लेकर अंतिम क्षणों तक
अनेक अनुभवों से गुजरना पडा। बचपन में आपने गुरु की गाय चराने का कार्य भी
किया। प्राचीन गुरुकुलों के ऋषिमुनियों के शिष्यों की तर्ज पर आप गुरु केसरनाथजी
की गायें लेकर भागली, रेवत तथा चित्तहरिणी के ऊँचे-ऊँचे रेत के धोरों में चराने
जाते थे। उस एकांत एवं सुरम्य वातावरण में ही आपके अन्दर भक्ति एवं योग का
प्रस्फुटन हुआ । आपने भैरुनाथजी के अखाडे़ के ऊँट एवं गायें भी बखुबी चराई,
पाली-पोसी। ऊंटों एवं गायों के भोजन के लिए आस-पास के गाँवों का एक एक
खेत, पूरा जंगल, आपके पद-चिन्हों से परिचित हो गया था। भागली, रेवत, बैरठ,
तड़वा, कलापुरा, पीजोपुरा सांफाडा सहित गाँवों के अलावा चित्तहरिणी के धोरों एवं
सिरे मन्दिर के पिछवाडे की तलहटी में गायें चराने, ऊँटों को चारे पानी के लिए
विचरण करते हुए आपके चरण कमलों के स्पर्श का सुख इन क्षेत्रों को भी को मिला।
गायों एवं ऊँटों के चारे हेतु खेजडी की पत्तियों को पाला इकट्ठा करते हुए आपके
कर-कमलों को खेजडी की डालें भी काटने का अनुभव हुआ। यह विधि का विधान
था अथवा कुछ और। इतने अमीर और दिव्य व्यक्तित्व को भगवान श्री कृष्ण जी तर्ज
पर एक ग्वाले की भूमिका भी स्वयं निभानी पड़ी। आपने शून्य से शिखर तक की
यात्रा शानदार एवं भव्यमय ढंग से पूरी की। सिरे मन्दिर पर अखण्ड ज्योत जलाने
हेतु घी (दिवेल) की उगाही एवं कटाला उगाही हेतु आसपास के पूज वाले क्षेत्रों के
सैकड़ों गाँवों के भाविक परिवारों के घर-घर जाकर अलख जगाया, पगलिये किये
एवं उन्हें शुभाशीष प्रदान कर धन्य कर दिया। छोटे-बडे, अमीर गरीब का भेद किये
बगैर आप प्रत्येक उस घर में पधारे जिसकी सिरे मंदिर के प्रति श्रद्धा थी। कटाला
उगाही के दौरान आप प्रत्येक गाँव के खेत, खलिहान एवं कुएं तक भी पधारे। आपके
चरण कमल से लोगों के घर, खेत, खलिहान, कुएं पवित्र हो गये । जहाँ-जहाँ आपके
पगलिये पडे़, वहाँ-वहाँ लीला लहर हो गई । आपसे मिलने के लिए श्रद्धा का सैलाब
उमड पडता था। उस समय आज की तरह वाहन सुविधा नहीं थी, आप ये यात्राएँ
बैलगाडी में अथवा पैदल करते थे। सिरे मंदिर से अखाड़े तक एवं इन गाँवों तक की
यात्रा करते-करते जीवन पर्यन्त आपके चरण कमलों ने मार्ग की प्रत्येक सीढी,
एक-एक पत्थर को धन्य कर दिया। आज सिरे मंदिर की सीढ़ियों एवं पहाड का एक
एक प्रस्तरखंड आपके व्यक्तित्व की भव्यता एवं दिव्यता की कहानी का स्वयं कहता
हुआ प्रतीत होता है। कणियागिरी पर्वत का एक-एक प्रस्तर आपकी यशोगाथा गा
रहा है।
आपका विलक्षण व्यक्तित्व चिरस्मरणीय है। आप अपने भक्तों के
हृदयरूपी मंदिर में सदा बिराजमान रहेंगे। बार-बार आपका स्मरण हो आता है।
आपके प्रति श्रद्धा अक्षुण्य है। आप हमेशा के लिए अमर है।
स्रोत: “सबके नाथजी” पुस्तक, संस्कृति शोध परिषद्, जालोर। पुस्तक क्रमांक 10।
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