🚩 सिरे मंदिर जालोर • जय श्री नाथजी महाराज री हुक्म 🚩

अथ श्री - श्री संदीप जोशी, सम्पादकीय

॥ जय श्री शांतिनाथजी महाराज ॥

।। श्री परमात्माने नम:।।

।। अथ श्री......।।
- श्री संदीप जोशी
सम्पादक
शिव महिम्न: स्त्रोतम भगवान शिवजी की आराधना की एक श्रेष्ठ स्तुति है।
स्वामी विवेकानन्द ने 11 सितम्बर 1893 को शिकागो में जब अपना विश्व प्रसिद्ध
पहला भाषण दिया था, तब उन्होंने हिन्दूधर्म का वास्तविक अर्थ समझाते हुए इस
शिवमहिम्न: स्त्रोत का ही एक श्लोक कहा था-रुचीनां वैचितर्यादृजु-कुटिल-
नानापथजुषां, नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव। इस महान स्त्रोत का ही
एक अन्य श्लोक है - महेशान्नाऽपरो देवो महिम्नो नाऽपरा स्तुति:,
अघोरान्नऽपरो मन्त्रो नास्ति तत्त्वं गुरो: परम्।।
अर्थात गुरु के समान कोई परम तत्व नहीं है । यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि
भगवान की महिमा और भगवान की भक्ति में लिखे गए स्त्रोत में भी परम तत्व
भगवान को नहीं गुरु को माना गया है । गुरु की महिमा में इस प्रकार के अनेक
श्लोक, स्तुतियाँ, दोहे, चालीसा, शास्त्र इत्यादि लिखे गए हैं। यहां तक कि सद्गुरु
को तो हमने साक्षात परब्रह्म माना है ।
देवभूमि भारत में सनातन धर्म की ऐसी श्रेष्ठ गुरु परम्परा के सच्चे वाहक,
साक्षात सद्गुरु अवतार थे-परमपूज्य प्रात:स्मरणीय श्री श्री 1008 श्री शांतिनाथजी
महाराज । सबके प्रति समान भाव और सबके लिए सम्मान रखने वाले संत। वर्तमान
समय में जब समाज के सब क्षेत्रों पर राजनीति का प्रभाव बढ रहा हैं, उस समय में
भी व्यापाक जनाधार के बावजूद राजनीति से एकदम निर्लिप्त रहने वाले संत । हर
दिल अजीज। सब उनके लिए आत्मीय, वे सबके लिए श्रद्वेय ।
टी.वी. चैनलो पर एक सीमेन्ट कम्पनी का विज्ञापन आता है कि ‘‘ इस सीमेेंट
में जान है’’। ऐसे ही मुझे लगता है कि जालोर की इस मिट्टी में जान हैं । यह
साधारण धूल नहीं है। यह जागृत मिट्टी है एवं संभवत: यही कारण है कि अति प्राचीन
काल से ही ऋषियों, योगियों, तपस्वीयों ने इस भूमि का चयन अपनी साधना के लिये
किया । यह भूमि जाबालोपनिषद के रचनाकार जाबालि ऋषि की तप:स्थली रही है।
और इसी कारण से जालोर को प्राचीन काल से ही जाबालिपुर नाम से जाना जाता
रहा है। इसी भूमि पर साक्षात शिव स्वरूप भगवान जलधंरनाथजी ने तपस्या की।
अनेक महान जैन संतो ने भी इस भूमि पर तपस्या की है, जिनमें पूज्य राजेन्द्रसूरीजी
का नाम सर्वज्ञात हैं । यह परम्परा आज भी जारी है। अनेक पूज्य साधु संत आज भी
इस भूमि की पवित्रता, इसके गौरव में वृद्धि कर रहे हैं । संभवत इन्ही कारणो से
जालोर को प्राचीन काल में आठवीं मोक्ष पुरी मानते थे। (सन्दर्भ-550 वर्षो से भी

अधिक प्राचीन कान्हडदेव प्रबंध ग्रंथ ) ।
परम पूज्य शांतिनाथजी महाराज अनादि काल से चली आ रही इस
गौरवशाली परम्परा के सच्चे वाहक थे । राष्ट्रीय स्तर के धर्म सम्मेलन धर्म सभाओं,
महाकुम्भ इत्यादि में जालोर उनके नाम से जाना जाता था । जालोर अर्थात्
शांतिनाथजी वाला। धर्म के क्षेत्र में आप जालोर के पर्यायवाची थे । ऐसे दिव्य संत
को जन्म देकर न केवल उनकी जननी वरन यह धरती भी धन्य हुई है, गौरवान्वित
हुई हैं । इस क्षेत्र के एक अन्य प्रमुख संत के मतानुसार तो उनकी उपस्थिति मात्र से
ही धर्म सभा, संत सभा की गरिमा बढती थी और वह कार्यक्रम पूर्णता प्राप्त करता
था। इन्हीं दिव्य संत व्यक्ति्व को समर्पित है यह पुस्तक ‘‘ सबके नाथजी’’।
राज्य के प्रमुख समाचार पत्रों के आंकलन के अनुसार महाराजजी की
अन्तिम यात्रा में 80 हजार से अधिक लोग पहुँचें। भाविकों की यह विशाल संख्या
उनकी लोकप्रियता को स्वत: स्पष्ट करती हैं । अचानक देवलोक गमन की दुखद
सूचना से भक्तों की जो मनोदशा हुई होगी उसे व्यक्त करना संभव नहीं है। पूज्य
शांतिनाथजी महाराज के प्रति उनके भक्तों-शिष्यों की श्रद्धाए अनन्त है । उनकी
कोई तुलना नहीं हो सकती। उन्हीं भावनाओं को शाब्दिक रूप देने का एक प्रयत्न
इस पुस्तक में किया गया हैं। यह पुस्तक कोई शोध ग्रन्थ न होकर एक भाव पुस्तक
हैं ।
महाराज जी सामान्यतया मंचीय भाषण, प्रवचन इत्यादि नहीं करते थे ।
भक्तों के साथ चर्चा में ही वे धर्म, ज्ञान, आध्यात्मिकता की चर्चा करते थे, जीवन जीने
का ढंग सिखलाते थे । महाराजजी के देवलोक गमन के बाद भी उनकी ज्ञान चर्चा
की धारा अविरल बहती रहें, उनके उपदेशों का लाभ आने वाली पीढ़ी को भी मिले,
इस भावना के साथ इस पुस्तक के प्रकाशन का विचार मन में आया । कार्य करते
समय पुस्तक के स्वरुप के बारे में नयी-नयी कल्पनाएँ और नए विचार आते रहे,
जुडते रहे । लम्बे समय बाद पुस्तक का वर्तमान स्वरूप बना । इस पुस्तक में संतो
का ज्ञान है, आत्मीय जनों का प्रेम है, भक्तों की भावनाऐं है, श्रद्धालुओं की श्रद्धा है,
कुछ दिव्य अनुभव है। जन मानस में वे नाथजी महाराज के नाम से जाने जाते थे
और सबके आत्मीय थे । सबके लिए सुलभ थे । इसी भाव के साथ पुस्तक का यह
नाम सबके नाथजी रखा गया हैं । यहां नाथजी से आशय पूज्य शांतिनाथजी
महाराज से हैं ।
पुस्तक को पूज्य संतो, भक्त जनों, श्रद्धालुओं के हाथों में सौंपते हुए अत्यन्त
आत्मिक आनंद की अनुभूति हो रही है। ईश्वर की अत्यन्त कृपा से ही यह काम
संभव हो पाया है । आप सभी को प्रणाम । पुस्तक में रही त्रुटियों के लिए अग्रिम क्षमा
याचना । पुस्तक के अन्तिम भाग में आपसे पुन: संवाद होगा ।
।। नमस्कार ।।

।। श्री गुरु चरण कमलेभ्यो नम: ।।

प्रथम - खण्ड
अविरल चलती रही साधना......

पूज्य शांतिनाथजी महाराज का
जीवन दिव्य एवं व्यापक था।
उसे शब्दबद्ध करना संभव नहीं है ।
पुस्तक के इस खण्ड में उनके
दिव्य जीवन का संक्षिप्त परिचय दिया गया है ।
उससे पूर्व नाथ सम्प्रदाय, उनकी कर्मस्थली
और तपस्थली का भी परिचय प्रस्तुत है ।

प्रणमूं म्हारा पीरजी, नमो नमो नवनाथ ।
जय जय शांतिनाथजी, सिर पर धरजो हाथ ।।

खण्ड-प्रथम

।। श्री गणपति वंदना ।।
विघ्नेशवराय वरदाय सुर प्रियाय,
लम्बोदराय सकलाय जगद्धिताय ।
नागाननाय श्रुति यज्ञ विभूषिताय,
गौरी सुताय गणनाथ नमो नमस्ते ।।

।। श्री सरस्वती वंदना ।।

।। द्वादश ज्योर्तिलिंग स्त्रोतम ।।


स्रोत: “सबके नाथजी” पुस्तक, संस्कृति शोध परिषद्, जालोर। पुस्तक क्रमांक 5।

Post a Comment

0 Comments