🚩 सिरे मंदिर जालोर • जय श्री नाथजी महाराज री हुक्म 🚩

साधना की स्थली - सिरे मन्दिर, जालोर

॥ जय श्री शांतिनाथजी महाराज ॥

।। साधना की स्थली - सिरे मंदिर-जालोर ।।

परम पूज्य शांतिनाथजी महाराज की साधना स्थली सिरे मंदिर भक्तों के लिए
विशेष महत्त्व का स्थान है। इसी स्थान पर महाराज जी ने तेरह बार चातुर्मास किए
एवं ब्रह्मलीन होने के पश्चात उनकी समाधि भी यहीं स्थापित की गयी है।
मानव जीवन के विकास का प्रत्यक्ष गवाह अरावली का पहाड़ और भगवान
श्रीराम और कृष्ण की यात्राओं का साक्षी राजस्थान का लगभग सीमावर्ती
जिला-जालोर। जिला मुख्यालय के दक्षिणी-पश्चिमी भाग में स्थित है दो
गौरवशाली पर्वत। दोनों अरावली पवर्तमाला का ही एक भाग। (जो विश्व की सबसे
प्राचीन पर्वतमाला मानी जाती है) । एक का नाम स्वर्णगिरी और दूसरी का नाम
कलशाचल। इसी कलशाचल पर्वत पर ही स्थित है परमयोगी पूज्य जलंधरनाथजी
की तपस्थली। वर्तमान में यह तीर्थ सिरे मंदिर के नाम से विख्यात है और पूरे
भारतवर्ष के भक्तों की आस्था का केन्द्र है । जालोर-बागोड़ा मुख्य मार्ग से बाएँ हाथ
की तरफ लगभग 2 कि.मी. चलने पर इस गौरवशाली पर्वत की चढ़ाई प्रारम्भ हो
जाती है । इस स्थान को पगलिए या चरणारविंद कहते है। आजकल पूज्य
शांतिनाथजी की प्रेरणा एवं सद्प्रयत्नों से आधी चढ़ाई तक वाहन जाने की सुविधा भी
प्रारम्भ हो गयी है । चढ़ाई के मार्ग में ही भगवान गणेश एवं हनुमानजी के मंदिर है ।
चारों तरफ से हरीतिमा को ओढ़े हुए अत्यन्त मनोहर वातावरण में स्थित है सिरे
मंदिर। इसी स्थान पर बैठकर प्राचीन समय में पूज्य जलन्धरनाथजी ने तपस्या की
और कई चमत्कारिक घटनाएँ भी हुई।
सिरे मंदिर का पूरा परिसर धर्म, संस्कृति और आध्यात्मिकता का संगम है ।
यह स्थान देश के नाथ सम्प्रदाय के स्थलों में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है । इस तीर्थ
पर अनेक पूजनीय स्थल हैं, जिनमें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है ‘‘ भँवर गुफा’’ । यहीं
तपस्थली है। यह एक विशाल शिलाखण्ड के नीचे गहरी और लम्बी गुफा है। इसमें
पवित्र शिवलिंग और पार्वतीजी, जलन्धरनाथजी, गणेशजी, कार्तिकेयजी की मूर्तियाँ
है एवं मार्बल एवं टाईल्स पर सुन्दर कार्य होने से यह स्थान अत्यन्त कलात्मक एवं
मनोहर हो गया है । पूज्य शांतिनाथजी महाराज की प्रेरणा से ही वर्तमान में गुफा पर
भव्य शिखरबद्ध मंदिर बना है। इस पूरे तीर्थक्षेत्र का यह प्राचीनतम स्थान है। प्राचीन
समय से ही इस पवित्र स्थान पर जलंधरनाथजी की साक्षात उपस्थिति प्राणवंत मानी
गयी है। इसके अलावा चन्द्रकूप एवं सूर्यकुण्ड (झालरा) यहाँ विशेष महत्त्व के जल
स्त्रोत हैं। ये दोनों स्थल भी पूज्य जलंधरनाथजी द्वारा ही निर्मित हैं। इनके जल के

आचमन को मोक्षदायक माना गया है।
रत्नेश्वर महादेव-सिरे मंदिर तीर्थ पर यह शिवालय भी पवित्र धरोहर है।
जालोर के स्वतंत्र राठौड नरेश रत्नसिंह द्वारा उन्हीं के नाम पर शिवबाण प्रतिष्ठित
हुआ। यह शिवालय मंदिर परिसर में पूर्वी भाग में एक वटवृक्ष के नीचे स्थित है ।
चंद्रकूप भी इसी परिसर में है । इस विशाल मंदिर पर झालरा है। मंदिर की जालियाँ
मार्बल पत्थर से अत्यन्त कलात्मक तरीके से बनायी हुई है ।
इसके अलावा चित्तहरिणी एवं जाखों का वड़ भी मनोरम एवं विख्यात स्थल है।
श्रावण मास, शिवरात्रि एवं अन्य महत्वपूर्ण प्रसंगो पर यहाँ विशाल मेला रहता है। ऐसे
अनेक भक्त है जो नियमित रूप से चढाई करके सिरे मंदिर दर्शन करने पहुँचते है।
।। सिरे मंदिर - एक अद्भुत दृश्य ।।


स्रोत: “सबके नाथजी” पुस्तक, संस्कृति शोध परिषद्, जालोर। पुस्तक क्रमांक 7।

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