॥ जय श्री शांतिनाथजी महाराज ॥
।। भक्तों की भावांजलि ।।
दर्द हुआ छू-मंतर.....
- श्री भलाराम देवासी, मड़गांव
प्रात: स्मरणीय, जन-मन के वन्दनीय संत भैरुनाथ अखाडा, जालोर के
गादीपति चितहरणी गुफा एवं सिरेमन्दिर जालोर के जीर्णोद्धार कतर्ता श्री श्री 1008 श्री
पीर शांतिनाथजी महाराज अघोर तपस्वी तथा ‘‘ यथा नाम तथा गुण’’ नामक
लोकोक्ति को चरितार्थ करने वाले हुए हैं।
श्री शांतिनाथजी महाराज ने अपने संन्यासी जीवन में सैंकड़ों चमत्कारिक परचे
अपने भक्तों को दिये है। इन्हीं परचों के संदर्भ में 1 उदाहरण का प्रत्यक्ष अनुभव मेरी
ज्ञानेन्द्रियों ने किया है। उनका वर्णन मैं यहां करना चाहूँगा ।
सन 1995 की बात है। मैं अपने छात्र जीवन में देवासी समाज छात्रावास में
रहते हुए जालोर काॅलेज में पढ़ रहा था। उस समय हमारे छात्रावास के अध्यक्ष श्री
सवारामजी पोषाणा वाले हुआ करते थे। सवजी पीरजी महाराज के अनन्य भक्त थे।
शांतिनाथजी महाराज की भी सवजी पर हमेशा असीम कृपा रहती थी। समय-समय
पर बिना सूचना के पीरजी महाराज देवासी छात्रावास जालोर मेें भी छात्रों को देखने
आया करते थे। जब सवजी छात्रावास में होते और वे दोनों गुरु-भक्त मिलते व बातें
करते तो ऐसा प्रतीत होता था कि ये दोनों गुरु-भक्त न होकर आपस में दोनो सगे
भाई हों।
सन 1995 में ही सर्दी की ऋतु में एक दिन सवजी एकदम स्वस्थ हालात में
राति्र को सो गए । जब सुबह वे उठे तो उनका पूरा शरीर जकड़ गया था। 1-2 दिन
छात्रावास में रहकर उनका डाॅक्टर से इलाज भी करवाया परन्तु कोई फर्क नहीं पड़ा।
सवजी ने शांतिनाथजी से मिलने की इच्छा प्रकट की । छात्रावास से बालक हरजीराम
को अखाड़े भेजा कि देखकर आ-पीरजी बावजी अन्दर है या नहीं । हरजीराम ने
देखकर बताया की बडे बावजी अन्दर ही बिराजमान है।
तुरन्त हम चार-पांच लोग सवजी को लेकर अखाडे पहुँचे तो महाराज प्रसन्न
मुद्रा में बोले कि आओ-आओ क्या बात है। बहुत दिनों बाद मिलने आया है। क्या कहीं
बाहर गया हुआ था ? सवजी बोले नहीं बावजी कही नहीं गया था । 2-3 दिन से
छात्रावास में ही था। मुझे तो पता नहीं क्या हुआ है कि 2-3 दिन से पूरा शरीर जकड़
सा गया है। इलाज भी करवाया परन्तु आराम नहीें है। बावसी ने पूछा कहां से जकड़ा
तो सवजी बोले पूरा शरीर जकड़ गया है। पीरजी ने पुन: पूछा दर्द ज्यादा कहां से है
इधर आ । तब सवजी ने पास जाकर अपनी कमर मेें ज्यादा दर्द होना बताया तो
स्रोत: “सबके नाथजी” पुस्तक, संस्कृति शोध परिषद्, जालोर। पुस्तक क्रमांक 43।
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