🚩 सिरे मंदिर जालोर • जय श्री नाथजी महाराज री हुक्म 🚩

साधु ऐसा चाहिए - श्री हरिशंकर राजपुरोहित

॥ जय श्री शांतिनाथजी महाराज ॥

।। भक्तों की भावांजलि ।।
साधु ऐसा चाहिए..............

- श्री हरिशंकर राजपुरोहित, जालोर
परम प्रभु की प्रभुता का गान, स्वभाविक रूप से अनादि स्व तथा पर के लिए
परमकल्याणकारी रहा है। इसी दिव्यभाव का अनुसरण करते हुए हृदय से पीर
शांतिनाथजी की सराहना करता हूँ जो सार्थक सिद्ध होगी।
पीरजी महाराज सिद्धसन्त शांतिनाथजी जो जालोर मठ के महन्त अधिष्ठाता
होने के साथ नाथ सम्प्रदाय के जाने माने प्रतिष्ठित पुंज थे। उनकी प्रशंसा जितनी
कि जाय उतनी कम है। उन्होंने जीते जी कभी भी आत्म प्रंशसा को पसन्द नहीं
किया। सामान्य सन्त-साधु का जीवन व्यतीत किया जबकि पूरे देश-प्रदेश में उनके
लाखों भक्त थे। हजारों संत-महंत उनके प्रशंसक व मित्र सहयोगी थे।
पूर्ण परमेश्वर, गुरु-भक्त, मित्र भक्त रहते हुए गाय एवं ब्राह्मणों की सेवा
जीवनपर्यंत करते रहे। धर्मपरायण होने के नाते अन्य धर्मों का भी सम्मान किया ।
अपने गुरु का सम्मान, उनकी गुफा का उद्धार, अनेक मंदिरो का निर्माण एवं
जीर्णोद्धार करने-कराने के साथ हजारों देवरों, मंदिरों, गौ-शालाओं, विद्यालयों के
प्रतिष्ठा समारोह आयोजित किये-करवाये। अनाथ एवं मित्रसंतो के लिए सर्वस्व
न्यौछावर करने का भाव अन्त समय तक बनाये रखा। गुरुगद्दी तथा संत समाज के
लिए अनन्त भक्ति हर परिस्थिति में बनाये रखी जो उनकी महानता का प्रतीक है।
प.पू. शंकरस्वरूपजी गायत्री आश्रम सांथू की अलौकिक मित्रता अंत तक
यादगार बनी रही, वैसी ही मित्रता व स्नेह अनेक संतों पूज्य कमलनाथजी आदि तक
प्रासंगित रही है। गौरक्षपीठ गोरखपुर के महन्त अवैद्यनाथजी का अभूतपूर्व स्वागत
तथा उनके योग्यशिष्य पू. आदित्यनाथजी का सम्मान समय-समय पर जालोर
बुलाकर करते रहे। इस महामानव व संत शिरोमणि के जीवन की अनेक कथाएं,
उनकी जीवनलीला, भक्तों को प्रसार व आशीर्वाद से हुए अप्रत्याशित लाभ, विभिन्न
प्रकार से दर्शन बहुत चर्चित एवं सर्वविदित हैं। चातुर्मास पर उनका सामान्य जन
भक्तों के साथ व्यवहार अनेक संत समुदायों के लिए अनुकरणीय व गुणग्राही बना
रहा है।
पीरजी जालोर से बाहर प्रवास पर कुम्भ मेले अथवा सुदुरप्रान्तों में देव दर्शन
को गये (रामेश्वरम से पशुपतिनाथ तक) तब उनकी दरियादिली एवं दानक्षमता से
वहां के पुजारी महंत प्रभावित हुए । मठ व सिरेमंदिर आने वाले साधु तथा घुम्मकड़
रमते राम तो पीरजी महाराज के दर्शन करके निहाल हो जाते थे। उनका जीना भी
सार्थक एवं सम्मानीय रहा और देवलोक गमन उससे भी शानदार ।

आज तक जालोर और आसपास जिलों में इतना द्रवित शोकाकुल समाज कभी नहीं
दिखा जितना इस महान संत पुरुष के लिए दिखा। सभी जातियों व धर्मावलंबियों ने
अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की थी।
एक छोटी घटना । जब सन 1977-78 में सिरे मंदिर पर भव्य आयोजन
महाराज मानसिंह व रत्नेश्वर महादेव मंदिर जिसे रतनसिंह पुत्र महेशदासजी राठौड़
ने जालोर में बनाया था, की 350-400 वर्ष की जयंति मनाने को लेकर था। परन्तु
विद्युत संबंध जालोर शहर में बडी पोल तक ही था। आगे तीन-चार किलोमीटर
सिरेमंदिर पहाड़ी व ऊपर तक कोई बिजली नहीं थी ।
वहां बिजली ले जाना नितान्त आवश्यक हो गया था तथा केवल पन्द्रह दिन
का समय महोत्सव हेतु बाकी था। तब आप श्री पीरजी के आग्रह पर मुझे यह कार्य
शीघ्र संपादित करने का दायित्व सौंपा गया । संयोग से मैं जिलाध्यक्ष जनता पार्टी
का कार्य संभाले हुए था तथा जनता सरकार थी। जब कठिनाई बताई तो पीरजी
महाराज ने कहा कि जोर लगाओ कार्य तो पहले ही पूरा हो जाएगा और इस ईश्वरी
वाक्य से कार्य दो दिन पूर्व ही हो गया। शिवभक्त श्री जोशी अधिशाषी अभियन्ता
जोधपुर वाले यहीं थे । उन्होंने कड़ी मेहनत कर पहाडी की तलहटी तक बिजली
लाईन व थम्बे डाल दिये और पीरजी के भक्त सुथार- लुहार कारीगरों ने के छोटे
थम्बे पहाडी पर लगाकर लाईन जोड दी अर्थात असंभव को संभव होते ऐसे
प्रसंग-घटनाओं का मैं साक्षी हूंॅ।
पीरजी महाराज शांतचित्त, परमकृपालु, परम सन्त बनकर रहें, कटाला लेते
समय भी मठ के संतों व कर्मचारियो को जोर जबरदस्ती नहीं करने का आदेश दे
रखा था। सबसे समान व्यवहार, आगन्तुकों का सत्कार, ऐसे विभूति को बारम्बार
नमस्कार ।

सोमनाथ वंदहु हरख, विश्वनाथ विश्वेस।
अंग भस्म गलनाथसर, शांतिनाथ उरदेश।।


स्रोत: “सबके नाथजी” पुस्तक, संस्कृति शोध परिषद्, जालोर। पुस्तक क्रमांक 40।

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