॥ जय श्री शांतिनाथजी महाराज ॥
।। परम भजनानंदी संत ।।
परम पूज्य सत्यानंदजी महाराज
रवि धाम, गुजरात
परम पूज्य शांतिनाथजी महाराज का व्यक्तित्व बहुत प्रभावशाली था। वे योगी
पुरुष थे । उनके जीवन में बहुत सी विशेषताएँ थी जिनको हमें सीखना चाहिए । वे
सबको साथ लेकर चलते थे । उनमें किसी के प्रति ईषर्याभाव नहीं था । उनकी सबसे
बड़ी विशेषता थी कि वे प्रतिभावान की कद्र करते थे । उन्हें आगे बढने का अवसर
देते थे एवं उन पर पूरा भरोसा करते थे । पूज्य बावजी भजनानंदी संत थे । दैनिक
कार्य को करते हुए भी एवं व्यापक सामाजिक, धार्मिक दिनचर्या के बावजूद वे
नियमित रूप से अपनी पूजा-ध्यान तप करते ही थे । ईश्वर का स्मरण सदैव करते
रहते थे। मैं एक बार लेटा कार्यक्रम में था । वहां पूज्य रणछोडभारतीजी महाराज ने
बहुत बड़ा महारूद्र यज्ञ करवाया था । वहां पर दूसरे वक्ता साधु नहीं थे तो मुझे
बोलने का अवसर दिया गया । वहां भक्तों की भारी संख्या थी । मैने अपनी
क्षमतानुसार विषय रखा । कार्यक्रम के बाद उन्होंने मेरी पीठ थपथपायी । इतनी बडी
धर्मसभा में इतने साधुओं एवं जनता में ठीक प्रकार से धर्म की चर्चा करने के लिए मुझे
आशीर्वाद दिया । आज जो कुछ भी मैं हूॅ उसमें उनका बड़ा आशीर्वाद है। कम शब्दों
में कहा जाए तो वे सच्चे महापुरुष थे ।
आज जब पूज्य बावजी हमारे मध्य नहीं हैं तो शिष्यों का कतर्तव्य होता है कि वे
उनके बताए मार्ग पर चले । शिष्य की सच्ची श्रद्धांजली, सच्चा धर्म तो यही होता है
कि वह अपने गुरू के बताए मार्ग पर चले । पूज्य शांतिनाथजी महाराज सिद्ध पुरुष
थे। सिद्ध पुरुष दुनिया से जाते नहीं है । वे हमारे मध्य ही रहते हैं और सदैव हमारे
मध्य रहेंगे । शरीर पंचभूतो से बना होता है। वह पंचमहाभूतो में ही विलीन हो जाता
है। लेकिन वो हमारे पास ही रहते है । यहां से न महर्षि अरविंद गए हैं न रामकृष्ण
परमहंस गए हैं न स्वामी विवेकानंद गए हैं । मेरे अनुसार ये कोई भी महापुरुष यहां से
नहीं गए है । सदैव हमारे आस-पास दिव्य स्वरूप में रहते हैं ।
एक खास बात और ! बावजी संतों के सिरमौर थे । उनके देवलोक गमन से
ऐसा लगता है जैसे परिवार का ही कोई बड़ा चला गया है । उनके बिना संतो की
सभाएँ कुछ सूनी-सूनी लगती है। उनका दिव्य आशीर्वाद सदैव हम पर बना रहे यही
कामना है ।
स्रोत: “सबके नाथजी” पुस्तक, संस्कृति शोध परिषद्, जालोर। पुस्तक क्रमांक 20।
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