॥ जय श्री शांतिनाथजी महाराज ॥
सतगुरु एवं देव वन्दना
पूज्य निर्मल नाथजी महाराज
सिरे मंदिर, जालोर
श्री श्री 1008 श्री पीरजी शान्तिनाथजी सहाय छै
गुरुजी श्री शान्तिनाथ प्यारा सिकन्दर हो तो ऐसा हो,
हरली सारे भक्तों की पीडा-पिरजी हो तो ऐसा हो ।। 1।।
छोडा घर बार दुनिया को, तोड दिया मोह माया को ।
पहना गुरु ज्ञान का चोला, निराला हो तो ऐसा हो ।। 2।।
पिता-माता कुटुम्बी को, त्याग गुरु चरण में आए ।
धराया नाम शांतिनाथ, महात्मा हो तो ऐसा हो ।। 3 ।।
किनी सतगुरु की सेवा, पिलाया भोलेनाथ प्रेम प्याला ।
दिनी महान पिर कि पदमी, सुहाना हो तो ऐसा हो ।। 4 ।।
दिखाया योगबल भारी, हुए महान तपो धारी ।
ध्यान का मार्ग अपनाया, निरंजन हो तो ऐसा हो ।। 5 ।।
बहाई ज्ञान की गंगा, पिलाया प्रेम का पंगा ।
रहे सभी भक्तों के संगा, नजारा हो तो ऐसा हो ।। 6 ।।
शिखर कन्यागिरी ऊपर, बनाए महल अती सुन्दर ।
योगी जलन्धर नाथ का मंदिर, बनाना हो तो ऐसा हो ।। 7 ।।
विष्णु महारुद्र यज्ञ किना, चातुर्मास गाँव-गाँ में किना ।
दान में सब कुछ दे दिना, दयालु हो तो ऐसा हो ।। 8 ।।
साधु व भक्तगण सारे, जपे शांतिनाथ को प्यारे ।
फिर भी जग से भी हे न्यारे, नियारा हो तो ऐसा हो ।। 9 ।।
तोड दुनिया के बन्धन को, सिधारे धाम अपने को ।
कहे निर्मल नाथ दुनिया से, उजागर हो तो ऐसा हो ।। 10 ।।
निर्मल पुकार
।। श्री श्री 1008 श्री पिरजी श्री शांतिनाथजी महाराज की वन्दना ।।
हे भगवान भोलेनाथ के भक्त, आपको हमारा नमस्कार हे।
है भगवान जलन्धरनाथजी के अवतार, हमारा आपको प्रणाम हैं।।
हे प्रभु श्री शान्तिनाथ जी ! संसार सागर में भटका हुआ आपकी शरण में आया था।
किन्तु अज्ञान तथा अहंकार के वशीभूत होकर आपको जान न सका इसके लिए मुझे
क्षमा करना क्योंकि आगे कहा गया है।
‘‘ सोहि जानही जिन्हें-तेहि जनाही’’।
अर्थात - आपको वहीं जान सकता हैं जिन्हें आप ही जनवा ले और जो आपको जान
लेता है वह आप में समा जाता है।
हे साधु सन्तों में श्रेष्ठ है ज्ञानियों में अग्रगण्य हे सिद्धों के सिद्ध हे नाथों के
नाथ मुझ अकिंचन अज्ञानी का नमस्कार स्वीकार करे । मेरी आपसे विनती है कि
आपके इस जन्म का वृतान्त जो कि आपके मुख से सुना है उसका वर्णन करने की
आज्ञा प्रदान करने की कृपा करावें । आदेश राव सिंहाजी, जिनके राव आस्थानजी
उनके जोपसाहजी, जोपसाह जी के हुए जोरा, जिनका जोरा वंश चला । उसी जोरा
वंश में आगे चलकर हुए रावतसिंहजी, जिनके चार पुत्र हुए 1. सांकलसिंहजी, 2.
बहादुरसिंहजी 3. मंगलसिंहजी 4. ओटसिंहजी यही ओटसिंहजी आगे चलकर श्री श्री
1008 श्री पीरजी श्री शान्तिनाथजी महाराज कहलाए ।
हे भगवान भोलेनाथ ! शिवशंकर ! कैलाश के वासी।
हे उमापती ! भगवान शंम्भो ! आपके दर्शन तो कभी हुए नहीं ।
किन्तु यदि आप होंगे तो मेरे दादा गुरु श्री पीर श्री शान्तिनाथजी जैसे ही होंगे।
इसलिए हे बाबा ! आपके अन्दर कितने गुण है मान, मर्यादा, ज्ञान, ध्यान, भक्ति भाव,
दया भावना, करूणा-क्षमता, धैर्यवान, ज्ञान वैराग्य, तपस्या योग, शील सन्तोष,
शान्ति तथा क्षमा इन प्रधान गुणों में से यदि एक भी गुण प्रदान करे तो आपकी बड़ी
कृपा हो जाती है। इसलिए हे सत्यम शिवम सुन्दरम ! हमारे अवगुणों को नहीं देखते
हुए हमारी भावना पर ध्यान देते हुए हम अज्ञानीयों को क्षमा करें, क्योकि हमारे अन्दर
तो एक ही ज्ञान है वह यही है कि हम आपके चरणों में हाथ जोड़कर खडे है। जैसा
आपको उचित लगे वैसा करें।
।। जय नाथजी री ।।
स्रोत: “सबके नाथजी” पुस्तक, संस्कृति शोध परिषद्, जालोर। पुस्तक क्रमांक 30।
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