🚩 सिरे मंदिर जालोर • जय श्री नाथजी महाराज री हुक्म 🚩

अद्भुत प्रूफ रीडिंग - श्री सुखसिंह बालावत

॥ जय श्री शांतिनाथजी महाराज ॥

-- ढ --
।। भक्तों की भावांजलि ।।
अद्भूत प्रुफ रीडिंग.....

- श्री सुखसिंह बालावत, बादनवाडी
बात उस समय की है जब बावसी का चातुर्मास देबावास ग्राम में था। मैं भी
अपने गाँववासियों के साथ बावसी के दर्शन लाभ हेतु देबावास गया था। चूंकि मुझे
अच्छे साहित्य व इतिहास पढाने का शौक था।मैंं जब भी बावसी के पास जाता
बावसी के पास रखी किताब लेकर पास बैठकर पढता था। यह बात बावसी को भी
मालूम थी। उस दिन सिरे मंदिर जालोर नामक पुस्तक जो सिरेमंदिर व
जलन्धरनाथजी के इतिहास के बारे में डा. भगवतीलाल शर्मा द्वारा प्रथम संस्करण
1995 ई. में प्रकाशित हुई थी, बावसी के पास रखी थी।
मैं प्रणाम कर बावसी से थोड़ा दूर बैठ गया। बावसी ने मुझे इशारे से पास
बुलाकर पुस्तक उठाकर मुझे दी व कहा कि इसमें कुछ गलतियाँ छपी हुई हैं उसे पेन
लेकर मैं कहूँ वैसे सुधार कर । फिर बावजी बिना पुस्तक को देखे पृष्ठ संख्या बोलते
गये और पैराग्राफ बताकर मुझसे लगातार अनेक त्रुटियों का सुधार करवाया । इस
प्रकार से यह संशोधन करवाकर बावसी ने यह पुस्तक अपने पास रख ली। मुझे इस
पुस्तक के प्रकाशन के बारे में उसी दिन मालूम हुआ । मैंने बावसी से पूछा कि ‘‘
बावसी यह पुस्तक कब छपी मुझे तो मालूम नहीं है। बावसी ने फरमाया कि तेरे पास
यह पुस्तक नहीं है तो सिरे मन्दिर ले लेना। मेरे मन में आया कि यही पुस्तक बावसी
दे देते तो अच्छा रहता । थोड़े क्षण बाद बावसी ने मेरी ओर देखकर कहा कि ‘‘ ले
यही पुस्तक तू ले ले और घर जाकर पढ़ते रहना’’ इस प्रकार उन्होंने मेरा मनोभाव
जान लिया। मै धन्य हो गया और पुस्तक ले ली।
यह बात मुझे तब मालूम हुई कि बहुत बडा लेखक भी जिस प्रकार से बावसी
अशुद्धियां संशोधित करवायी है वो नहीं कर सकता क्योंकि उन्होंने इन पृष्ठों पर
किसी प्रकार के निशान नहीं किए थे। मुझे आदेश देते और मैं पृष्ठ पलटता और
कहते इस जगह फला अशुद्धि है उसे काट। इस प्रकार से किसी पुस्तक की पु्रफ
रिडिंग करना मेरे लिये एक अद्भूत अनुभव रहा ।
एक और अभूतपूर्व चमत्कार हमें मिला । कई वर्षों पहले हमारे गांव में बावसी
स्वयं सिरे मंदिर की झोली हेतु पधारते थे और गांव वासियों के आग्रह पर घर-घर
पैदल घूमते थे, पगलिये करते थे। एक बार इसी प्रकार हम गांव में बावसी के
साथ-साथ झोली (गेहू का कटला जो साल में एक बार निकालते है) में निकले थे
और हमारे गांव के मुनीलालजी सोनी के घर गये। वह भी बावसी का भक्त था।

बावसी विराजे हुए थे। सोनीजी घर के अन्दर बावसी को भेंट देने हेतु कुछ लेने गये
और थोडा समय व्यतीत हुआ। नहीं आने पर बावसी उठ खडे हुए। हम सभी साथ में
खडे हुए और पीछे चल दिए । थोडी दूर ही गये कि मुनीलालजी पीछे दौड़ते हुए आए
और बावसी के आगे हाथ जोेड़कर खडे हुए। बावसी से विनती करने लगे कि वापस
घर पधारो।
बावसी ने फरमाया कि भाई तुजे जो देना है, वह दे दे। अब वापस क्या काम ।
उन्होंने विनती कि की घर पधारो। तब साथ में सभी भक्तों ने भी बावसी से अर्ज की
और बावसी पुन: उसके घर पधारे । उन्होंने बावसी को सोने की चेन पहनाई (भेंट
की) । इस पर बावसी ने फरमाया, अरे भाई यह कंचन, कामिनी हमारे क्या काम की ।
बावसी ने उसे लेकर अपने बटुए में रखा। रास्ते में बावसी ने फरमाया कि एक बार
और मुझे एक भक्त ने सोने की अंगूठी पहनाई वो भी मैंने पास में बैठे एक जने को दे
दी। साधू को सोने क्या जरूरत। इस प्रकार बावसी के सानिध्य में मुझे काफी
चमत्कार प्राप्त हुए । बावसी इतिहास के गहरे जानकर थे। इतिहास की कई घटना
तो बावसी आंखो देखी घटना हो जैसे बताते थे।


स्रोत: “सबके नाथजी” पुस्तक, संस्कृति शोध परिषद्, जालोर। पुस्तक क्रमांक 49।

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