🚩 सिरे मंदिर जालोर • जय श्री नाथजी महाराज री हुक्म 🚩

नाथजी परम सात्विक महात्मा थे - पूज्य गंगाभारतीजी महाराज

॥ जय श्री शांतिनाथजी महाराज ॥

नाथजी परम सात्विक महात्मा थे.....

परम पूज्य गंगाभारतीजी महाराज
जागनाथ मठ, नारणावास
श्री शांतिनाथजी महाराज अच्छे व्यक्ति थे, सात्विक महात्मा थे। हम हमेशा
साथ रहे । अच्छे थे । नेकी वाले और धार्मिक थे। छलकपट बिल्कुल नहीं था। सिरे
मंदिर के प्रति अत्यन्त श्रद्वावान थे। वहां काफी कार्य करवायें, रास्ते का भी काम
करवाया। भव्य मंदिर बनाने की उनकी इच्छा थी। काम प्रारम्भ भी करवाया परन्तु
भगवान को पता नहीं क्या इच्छा थी। महाराजजी के देवलोक गमन के बाद काम पूरा
हुआ। उनके जीते जी पुरा बन जाता तो उन्हें बहुत अच्छा लगता । बाद में भी मदिर
उनकी इच्छा के अनुरूप बहुत अच्छा बनाया है। उनका मन सदैव भगवान में था सत
में था। महाराजजी के देवलोक गमन से हमको भी बहुत दु:ख हुआ, चिंता हुयी।
उनके निधन पर मन को बहुत समझाया फिर भी रोना आ गया। बैठकों और सभाआेंं
में सदैव साथ रहते, हमारा साथ उठना बैठना था। वह साथ छुट गया ।उनके
परिवार वालो जितना ही दु:ख हमें भी हुआ। जालोर में अखाड़े के सब संत भी
अत्यन्त दु:खी हुए थे। सब रो रहे थे। नाथजी महाराज अनेक लोगों को सहारा थे ।
उनका वह सहारा चला गया। सबका मानना था कि बावसी बैठा है तो मौरे हेंग
हावल है। देवलोक गमन से थोडे दिन पहले ही हमारा रेवत में मिलना हुआ था।
नाथजी विराजमान थे। मैं वहां नीचे बैठने लगा तो प्रेम से रोक लिया, पंलग मंगवाकर
मुझे भी आसन दिया। मैंने विनम्रता से कहा कि छोटे बड़े का आयु का लिहाजा करना
चाहिए इसलिए मैं नीचे बैठ रहा हूॅं। तब उन्होंने कहा-महादेव बडा है। अपने में कौन
छोटा-बडा। फिर उन्होंने आग्रह करके पास में बिठाया और हमारी बातचीत हुयी।
महाराजजी के स्वास्थ्य के बारे मे पूछा कि आपकी तबीयत कैसी रहती है। तब
उन्होंने फरमाया कि शरीर अब ठीक नहीं रहता है और शायद जाने के दिन आ गए
है। उन्होंने कभी किसी से ईष्या नहीं की कि ये तेरा है या मेरा है। किसी के पास
अधिक है, कम है। वे अत्यन्त धार्मिक व्यक्ति थे। दो तीन महिने बाद एक बार सपने में
दर्शन भी दिए। वो बैठे हुए थे। कुछ बात कही, वाणी सुनाई । इतने में मेरी नींद खुल
गयी। नाथजी वचन सिद्ध थे उनकी कही बातें सच होती यह कई बार अनुभव में
आया। अन्य साधुओं की सहायता भी करते। गरीब अमीर सब भक्तों से एक जैसा
व्यवहार रखते। अत्यन्त दयालु एवं मर्यादा का पालन करने वाले साधु थे। इससे
अधिक और क्या कहूँ। भगवान सबको आशीर्वाद दे।


स्रोत: “सबके नाथजी” पुस्तक, संस्कृति शोध परिषद्, जालोर। पुस्तक क्रमांक 16।

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