🚩 सिरे मंदिर जालोर • जय श्री नाथजी महाराज री हुक्म 🚩

श्रद्धा के पुष्प - श्री मानवेन्द्रसिंह राजपुरोहित

॥ जय श्री शांतिनाथजी महाराज ॥

सोमवार संजोग निराला था, गादी जन्म दीक्षा वाला था ।
सोम के छिपते चन्दे को, प्रणाम हमारा कह देना।
देह कोमल निराली थी, मूर्ति आली आली थी।
सहज समाधि के मौनी को, प्रणाम हमारा कह देना।
भक्त दर्द भरा दीदार कर रहे थे, दिल भर-भर रो रहे थे।
भक्तों के मन मोहन को, प्रणाम हमारा कह देना ।
मेला जालोर अलबैला था, भक्तों का अद्भुत रैला था।
सिरे धाम के चलते सूरज को, प्रणाम हमारा कह देना ।
नर नारी सब बिलख रहे थे, सन्त महन्त भी सिसक रहे थे।
इस सिरे मन्दिर सिर ताज को, प्रणाम हमारा कह देना।
यह भक्त किशोर की हैं अर्जी सुन लेना पीरजी एक अर्जी ।
भक्तों की नाव उबारन को, प्रणाम हमारा कह देना ।

।। श्री शान्तिनाथजी महाराज की जय ।।

श्रद्धा के पुष्प

सिरे मंदिर रै उपरै, लीन होग्या नाथ ।
भगत मौखला बिलखै है, ओळयूँ कर शांतिनाथ ।।
ओटसिंह बणंर जळमियाँ, पायो जलंधरनाथ।
मनवसिया केशरनाथ रै, अर बाज्या शांतिनाथ ।।
जाबालि री धरती रा, थे हो विरला-नाथ।
जस कमायो पीर रो,चाँरू दिशा शांतिनाथ ।।
अरपण थाने फुल करूँ, के जीवन म्हारा नाथ ।
लिखतो लिखतो रूँधग्यो, ‘‘मानव’’ शांतिनाथ ।।

- मानवेन्द्रसिंह राजपुरोहित


स्रोत: “सबके नाथजी” पुस्तक, संस्कृति शोध परिषद्, जालोर। पुस्तक क्रमांक 34।

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