॥ जय श्री शांतिनाथजी महाराज ॥
।। भक्तों की भावांजलि ।।
गुरुवर के नाम एक भाव पत्र
- श्री अशोकसिंह ओपावत, भीनमाल
हे ! गुरु श्रेष्ठ,
चरण कमलों की धुलि को साष्टांग प्रणाम,
स्मृति के श्वेत पृष्ठों पर उस आहट ने मानो काले अक्षर उकेर दिए हों या यों
कहें कि यादों की राख के ढेर पर हवा के झोंखे का प्रहार कुछ ऊंचाइयां दे गया हो!
और धूँ-धूँ करती स्मृति पटल पर अक्सों की बाती जलने लगी । कुछ खास था उस
आहट में जिसने मेरे अन्तर्मन में हिल्लोल का उद्भव किया । ये आहट कुछ सुनहरी
सी.....शायद......हां शायद.........तमन्नाओं को अपने अन्दर समेटे हुए थी । दिव्य प्रभा
के आगे की आहट विस्मृत कर दूँ इतना तो साहस मेरे हृदय में नहीं हैं । आहट की
निकटता ने मेरा धैर्य मुझसे छिन लिया और मैं पलटा, लेकिन वहाँ तो कुछ भी
दृष्टिगत नहीं हो रहा था। हो भी कैसे सकता है ? कुछ दूरियां ऐसी होती हैं जो पास
होकर भी दूर बहुत दूर होती है । कोई मिलन ऐसा होता है जो मिलन होकर भी विरह
वेदना देता है। धरती आसमां का मिलन । शायद ऐसा ही कुछ है मेरें अहसासों की
बूंदों के साथ..........शुष्कता सिर्फ शुष्कता लिए है, लेकिन वह तो मेरे पास है, बिल्कुल
पास हवा बनके । मैं महसूस कर रहा हूं आपका सामीप्य, आपका स्पर्श, आपके अमृत
तुल्य वचन । मैं सुन रहा हूं आपकी हंसी, आपकी आहट.............पर पल में खामोशी ।
अकेली खामोशी जो हाथों से छूटती हुई, फिसलती हुई सी, हाथों में एकाकीपन की
लकीर सी ! खामोशी का मुझको सहलाना शायद यही मेरा नसीब हो और शायद
यही सकून भी दे रहा था । जीवन की आपाधापी के जाल में फँसा पंछी फिर से पिंजरे
की स्याह धुंध में सिमटसा गया । जीवन की यह धुंध दिखने में तो दीप शिखा लगती
है, पर पतंगे को तो जल कर राख ही होना होता है ।
हे ! गुरुवर, आपके साथ बिताये प्रत्येक पल और उन पलों में मेरे कानों ने
सुना वह प्रत्येक शब्द याद है मुझे, परन्तु कुछ प्रश्न आज भी यक्ष प्रश्न की भांति मुझे
उच्चाटित करते हैं । उन प्रश्नों का उत्तर मैं कहाँ ढूंढे ? कैसे ढूँढूँ ? कौन मुझे आपकी
तरह बतलाएगा ? आपने भी तो अपना परिचय अपने आप दिया था। करुणावश,
अन्यथा मैं कैसे जाना पाता? बुद्धि मुझे आपके द्वार तक ले गई लेकिन वहां आपकी
कृपा पूर्ण मौजूदगी थी जिसने मुझे भीतर प्रवेश दिया । आपके बिना कौन मुझे उस
गडे़ हुए खजाने तक पहुँचायेगा ? कौन मेरे हृदय के दर्पण को चमकायेगा ? कैसे मैं
ईश्वर को जान पाऊगां ? अब तक तो मैं खुद को भी ठीक से नहीं जान पाया हूँ। क्या
निराकृति को भी आकृति का आलम्बन आवश्यक है ? ध्यान से ध्येय कैसे प्राप्त होता
है। क्या एक ही मंत्र से सबकुछ प्राप्त हो सकता है। कौन मुझे बतालायेगा ? गुरुदेव
आप ही बतालये !
स्रोत: “सबके नाथजी” पुस्तक, संस्कृति शोध परिषद्, जालोर। पुस्तक क्रमांक 41।
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