🚩 सिरे मंदिर जालोर • जय श्री नाथजी महाराज री हुक्म 🚩

शांतिनाथजी को शत्-शत नमन - श्री साबीर खान

॥ जय श्री शांतिनाथजी महाराज ॥

शांतिनाथजी ने अपनी माला में ध्यानकर सवजी की कमर पर हाथ घुमाते हुए अखाड़े
से लोटा पानी से भरवाकर उसमें कुछ भस्म डालकर कहा ले ये पी ले।
कुछ देर हम सभी लोग बावसी के पास बैठकर छात्रावास में आ गए । दूसरे
दिन सवजी सुबह जब जगे तो हम सभी लोगों ने देखा कि वे अब बिलकुल ठीक हो
गये थे। उसके बाद सवजी लगभग 15 वर्ष जीवित रहे । तब तक उन्हें किसी प्रकार
का वैसा कोई दर्द नहीं रहा।
ये सब पीरजी महाराज का चमत्कार ही था या फिर अपने भक्त को मिलने हेतु
बुलाने का एक तरीका ।
आज पीरजी महाराज धरती पर हमारे बीच नहीें रहे, परन्तु वे साक्षात हैं और
आज भी स्वर्ग में रहते हुए समस्त मानवता पर दया दृष्टि रखते हुए हमे सन्मार्ग की
ओर जाने हेतु सदा प्रेरित करते है।
इसी आशा एवं सद्विचारों के साथ मैं अपनी लेखनी को विराम देना चाहूँगा।
जय श्री शांतिनाथजी महाराज की ।
’’’’’’
पीर शांतिनाथजी को शत्-शत नमन
साबीर खान
ब्यूरो चीफ, राष्ट्रदूत
पीर शांतिनाथ महाराज के ओजस्व को मैंने उस दौरान पहचाना जब वर्ष 2007
में पीरजी जालोर किले पर स्थित शिव मंदिर में चातुर्मास के लिये विराजे हुए थे।
राष्ट्रदूत के मालिक सोमेश शर्मा, पत्रकार विश्वबन्धु शर्मा, कम्प्युटर आॅपरेटर
असलम खां खोखर और मैं जालोर दूर्ग का भ्रमण करने पहुँचे । हम दुर्ग का भ्रमण
करते-करते शिव मंदिर पहुँचे । वहां पीर शांतिनाथ महाराज चातुर्मास कर रहे थे तथा
उनके आसन के आगे कई भक्त बैठे हुये थे। मैंने, विश्वबंधु शर्मा व असलम ने हमारे
बाॅस सोमेशजी शर्मा को पीरजी के दर्शन करने को कहा, लेकिन हमारी इच्छा कुछ
डावडोल हो गई कि पीरजी के दर्शन बाद में कर लेंगे। पहले दुर्ग का पूरा भ्रमण किया
जाये। वहीं बाॅस को भी साधु-महात्माओं पर थोडा कम ही विश्वास था। हम जैसे ही
शिव मंदिर के मुख्य दरवाजे से जाने लगे, तभी पीरजी के चमत्कार ने हमारा एकदम
मन बदल दिया तथा न जाने हमारे मन में क्या विचार आया कि पहले मैं, फिर
विश्वबन्धु व बाद में असलम ने पीरजी के चरण स्पर्श कर उनके सामने बैठ गये ।
थोडी देर में हमारे बाॅस सोमेशजी भी पीरजी के दर्शन कर उनके सामने बैठ गये।
संभवत: महाराजजी ने अपनी अनर्तआत्मा से यह जान लिया कि मेरे दरवाजे पर आया
। मेरा भक्त मुझे मिले कैसे जा रहा है। तब मैं मन में सोचा की यह साधारण मनुष्य
नहीं हैं। अवश्य कोई दिव्य विभूति है। उन्हें बारम्बार वंदन ।


स्रोत: “सबके नाथजी” पुस्तक, संस्कृति शोध परिषद्, जालोर। पुस्तक क्रमांक 44।

Post a Comment

0 Comments