॥ जय श्री शांतिनाथजी महाराज ॥
!! अपनी बात !!
- नीलम पंवार
सह सम्पादक
जीवन बनाया तपोवन जिन्होंने,
जब से हुआ,
अवतरण धरा पर आपका तभी से,
सेवा व समाज हेतु सब कुछ अर्पण किया।
जो ज्योति बन जले सभी के अन्तर मन में,
जोड़ा जिन्होंने हर व्यक्ति को प्रेम बन्धन से,
लाकर छोड़ा सभी को भक्ति के मार्ग पर,
जो चला
हो गया पार भव से,
जो न चला उसके हाथ मात्र पछतावा रहा, ।
आप ज्योति स्वरूप देव का
क्या करू बखान ।।
इस जहाँ में आप हेतु मात्र यही कि जप-तप-शास्त्र जो भी ब्रह्म ज्ञान है, उसके आप
थे। प्रत्यक्ष उदाहरण आप का व्यक्तित्व विशालता लिये हिमालय पर्वत से भी कई
गुना ऊचाँ, विशाल समुद्र से भी अनगिन गहरा, सभी उपमाए आप के आगे छोटी ।
बस यही की साक्षात ईश्वर ही थे, आप धरा पर ।
एक कवि ने कहा है कि धरती का कागज करू, सम्पूर्ण वन की कलम व
समस्त सागर की स्याही करूँ तो भी मैं उन परम पिता के गुणों का गुणगाण नहीं कर
सकती । आप उपमा रहित दिव्य पुरूष थे ।
इस पुस्तक आप के जीवन से कुछ अमूल्य मोतीयों को आपके संदेश के रूप
में लेने जा छोटा सा प्रयास किया हैं। आप जैसे महात्मा के संदेश हमारे सभी के
जीवन को श्रेष्ठ बनाने हेतु मार्गदर्शन बने इस प्रयास में निश्चित तौर पर
कुछ-न-कुछ कमी रही होगी उसके लिए मैं आप सभी पाठकों से क्षमा चाहूँगी व
यह पुन:पुन: आग्रह करूगी कि अच्छे श्रेष्ठ संदेशो को अपने जीवन में उतारकर आप
सभी पीरजी महाराज का आशीर्वाद प्राप्त करते रहे व आप सभी का जीवन दाता की
कृपा से सुखी, सम्पन्न बनें ऐसी शुभ कामना ।
स्रोत: “सबके नाथजी” पुस्तक, संस्कृति शोध परिषद्, जालोर। पुस्तक क्रमांक 2।
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