🚩 सिरे मंदिर जालोर • जय श्री नाथजी महाराज री हुक्म 🚩

इति समर्पणम् - संदीप जोशी, सम्पादकीय

॥ जय श्री शांतिनाथजी महाराज ॥

।। इति समर्पणम ।।
- श्री संदीप जोशी
सम्पादक

परमपूज्य शांतिनाथजी महाराज जैसे दिव्य पुरुषों के बारे लिखने का योग बनना ही
अपने में सौभाग्य की बात है। महाराष्ट्र के श्रेष्ठ संत ज्ञानेश्वर महाराज का कथन है
कि संत चरित्र के रचनाकार से परमात्मा अति प्रसन्न होता है। तुलसीदासजी ने भी कहा
है कि - साधू चरित्र शुभ सरिस कपासूू । निरस, विषद गुणमय फल जासु ।।
जो सहि दु:ख पर छिद्र दुटावा । वंदनीज जे ही जग जस पावा ।।
भक्तों की भी संतों की सेवा करने की इच्छा बनी रहती है । संतो की कार्य पूर्ण करा
लेने की प्रणाली भी विचित्र ही है। वास्तव में प्रेरणा तो संत ही किया करते हैं । भक्त
तो केवल निमित्त मात्र या कार्यपूरा कराने के लिए सहयोगी यंत्र मात्र हैं। उदाहरण
यह पुस्तक स्वयं हैं ।
महाराजजी की कृपा के बिना यह कार्य संभव ही नहीं था । पुस्तक की विषय
वस्तु भी शायद दिव्य स्वरूप में महाराज जी तय कर रहे थे । हमने अनेक लोगो से
अपनी भावाजंलि लिखकर देने का आग्रह किया। उनमे कुछ बडे लोग भी थे ।
सहमति देकर, लम्बा इंतजार करवाकर भी वे नहीं लिख पाए । शायद महाराजजी
की यही इच्छा रही हो । प्रकाशन भी पहले कोई अन्य मित्र करने वाले थे । सारी
आर्थिक व्यवस्था भी उन्हे ही करनी थी । मगर लम्बे समय बाद भी यह कार्य नहीं
कर पाये, यह महाराजजी की लीला हैं । पुस्तक में विज्ञापन नहीं छापने की इच्छा
प्रारम्भ से ही थी और नाथजी की कृपा से सारी व्यवस्था हो गयी । ऐसे और भी बहुत
से अनुभव आये जिनसे लगा कि वे सचमुच लीलामय हैं । समझ पाना कठिन हैं ।
इसलिए व्यक्तिगत रूप से मुझे तो यह लगता है कि सद्गुरु को समझने का प्रयत्न
ही नहीं करना चाहिए । पर्याप्त सोच विचार कर गुरु बनाना चाहिए । किन्तु बनाने
के बाद श्रद्धा । केवल श्रद्धा ! उनके प्रति श्रद्धा ही रखनी चाहिए, अत्यन्त गहरी
श्रद्धा । तब ही समाधान मिलता हैं । भगवान कृष्ण ने श्रीमद भगवद गीता में स्वयं
कहा है ‘‘श्रद्धावान लभते ज्ञानम्’’ । पुस्तक के लिए चर्चा करते समय महाराज जी
के बारे में भी कई नयी प्रेरणादायक जानकारियों मिली । जैसे उन्हें योग-प्राणायाम
की अच्छी जानकारी थी, एवं वे स्वयं इसका अभ्यास करते थे, दान देने की उनकी
पद्धति-बड़े नोट पर छोटा नोट लपेट कर देना।
देशभर में फैले महाराजजी के भक्तों के पास उनकी कृपा के चमत्कार के
अनेक किस्से है जिनके वे स्वयं प्रत्यक्ष गवाह हैं । ऐसी कुछ घटनाओं की चर्चा इस

एक अनुभव-मैंने इस पुस्तक से पहले एक अन्य पुस्तक पर कार्य किया था । पूर्ण
रूप से तैयार होने के बाद भी वह 8-9 महिने तक प्रकाशन के इंतजार में अटकी रही
थी । सबके नाथजी इस पुस्तक का कार्य नवम्बर 2012 में ही प्रारम्भ कर दिया था ।
इस विषय पर योजना प्रारम्भ करते ही संयोग से पहले वाली किताब के भी प्रकाशन
का योग बन गया । स्वामी विवेकानन्द के जीवन पर आधारित वह पुस्तक -सिंह
गर्जना नाम से प्रकाशित हुई । पटना में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह
माननीय सुरेशजी सोनी एवं अखिल भारतीय विद्याथी परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष मा.
मुरलीधरनजी के हाथ से उसका विमोचन हुआ । इससे बडा सौभाग्य एक कार्यकर्ता
के लिए क्या हो सकता हैं ? मुझे लगता है कि सिंह गर्जना पुस्तक के प्रकाशन एवं
विमोचन में भी महाराजजी का बडा आशीर्वाद हैं । पुस्तक देशभर में गयी और सर्वत्र
सराही गयी । ऐसे कृपा पूर्ण अनुभवों की अनंतकथा है महाराजजी का जीवन ।
इस पुस्तक का विचार मन में आने से लेकर भक्तों के हाथ में पहुंचाने तक
की यात्रा में अनेक सज्जनों ने अपना महत्वपूर्ण सहयोग किया । उन सबके प्रति
हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त करता हूॅ । परम पूज्य गंगानाथ जी महाराज से सहजता से
आशीर्वाद पूर्ण अनुमति दी, यह अत्यन्त सौभाग्य का विषय हैं। पूज्य प्रेमनाथजी
महाराज एवं पूज्य नारायणगिरी जी महाराज ने लगातार इस सबंध में पूछताछ की
एवं हौसला बढाया। दोनों पूज्य संतो का प्रोत्साहन इस पुस्तक का आधार है।
पुस्तक प्रकाशित होकर पाठको तक पहुंची है यह पूज्य संतों की ही कृपा हैं। सभी
पूज्य संतो ने सहर्ष अपने विचार, अपनी भावनाएॅं प्रकाशित करने की अनुमति दी ।
उनकी कृपा से ही पुस्तक की प्रतिष्ठा बढी हैं । संघ के सह प्रांत प्रचारक
राजारामजी भाई साहब ने पुस्तक की भूमिका लिखने का आग्रह स्वीकार कर
आत्मीय कृतज्ञता की हैं । आदरणीय मधूसुदनजी व्यास ने समय-समय पर
मार्गदर्शन किया । आयु के बडे होने पर भी खीमसिंहजी बागरा, मादाभारतीजी,
खीमसिंहजी बाकरा रोड, खीमारामजी सुथार, सुरेन्द्रसिंहजी, कैलाशजी खत्री,
महेन्द्रजी सोलंकी, नरेशजी व्यास ने मित्रवत सहयोग किया। प्रुफ रीडींग का कष्ट
साध्य कार्य करने में श्री जितेन्द्र शर्मा, विनोदजी कुट्टी, अनिलजी प्रजापत एवं
यशवन्तजी गहलोत ने सहयोग दिया । ब्राह्मणी स्क्रीन प्रिण्टर्स के शंकरलालजी एवं
नारायणजी गहलोत को भी साधुवाद। सबके प्रति कृतज्ञता । पुस्तक के लिए अपने
अनुभव भेजने वाले नाथजी महाराज के सभी भक्तों का बारम्बार प्रणाम क्योंकि भक्त
भगवान से भी बड़ा होता है ऐसा माना जाता हैं।
पूज्य माता पिता के श्री चरणों में प्रणाम करने हुए मैं अपनी बात समाप्त
करता हूँ ।
।। जय नाथ जी की सा ।।


स्रोत: “सबके नाथजी” पुस्तक, संस्कृति शोध परिषद्, जालोर। पुस्तक क्रमांक 50।

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