॥ जय श्री शांतिनाथजी महाराज ॥
परोपकारी संत - श्री नाथजी महाराज
परम पूज्य गौऋषि दत्तशरणानंदजी महाराज
गौधाम-पथमेडा, नंदगांव
सदैव शांत, सौम्य एवं सभी के लिए सद्भावनापूर्ण ममता युक्त आशीर्वाद का
भाव लिए गोलोकवासी प. पू. श्री शांतिनाथजी महाराज का पावन सानिध्य ही
भक्त-भाविकों के लिए अनुपम आशीर्वाद था । सम्पूर्ण मारवाड़ के सभी सम्प्रदायों के
संत समाज तथा लौकिक छत्तीस कौम समाज के लिए पूज्य श्री नाथजी समान रूप से
आराध्य की भांति शीतल छाया प्रदान करने वाले प्रेरणापुंज थे। उनके सानिध्य से
प्रत्येक सात्विक व श्रेष्ठ कार्य में संलग्न व्यक्ति, समूह एवं सेवा प्रकल्पो को सदैव
अनुपम आशीर्वाद व सहज बल मिलता रहा ।
भौतिक दृष्टि से पूज्य श्रीनाथजी का जीवन मारवाड़ धरा एवं नाथ संप्रदाय के
लिए ही नहीं अपितु सम्पूर्ण राष्ट्र तथा सर्वपंथ संतसमाज के लिए कभी पूरी न होने
वाली क्षति है। परन्तु शरीर के गुण व विधान के अनुरूप ऐसे दिव्य महापुरूषों के लिए
शिवलोकवास (गोलोकवास) भी सामान्य प्रक्रियात्मक कड़ी की भांति एक पडाव ही
होता है। सही में पूज्य श्री सूक्ष्म स्वरूप में सदैव सभी सात्विक शक्तियों सहित हमारे
साथ है तथा उनके आदर्शमयी जीवन पथ पर चलने का संकल्प ही हमारी सबसे
उत्तम श्रद्धांजली होगी । पूज्यश्री का व्यक्तित्व एवं कृतित्व सदैव ‘‘ऊँकार’’ की भांति
एकाकार रहा । पूज्यश्री द्वारा प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष अनेकानेक प्रकार से मानवता को
पोषित करने वाली सेवाओं और प्रेरणास्पद परिस्थितियों का निर्माण होता रहा ।
जीवनपर्यन्त पूज्यश्री नाथजी मानवता एवं राष्ट्र को आगे ले जानी वाली
शक्तियों तथा समस्त प्रकार के सेवाकार्यों में संलग्न व्यक्तियों और संस्थाओं को अगाध
प्रेम व स्नेह करते रहे तथा जहां-जहां श्रेष्ठ कार्यों में उनकी आवश्यकता होती, वहां वो
बिना आग्रह किये स्वयं स्वत: ही साथ हो जाते । स्पष्ट है कि उनकी दृष्टि में
अपना-पराया लेशमात्र भी नहीं होकर यह संसार भगवद्भाव स्वरूप ही रहा। वर्तमान
समय में पूज्यश्री नाथजी का जीवन प्रत्यक्ष में साक्षात श्रीगीताजी के सांख्ययोग एवं
कर्मयोग दोनों स्वरूपों का जीवंत महानतम उदाहरण रहा ।
गोसेवा-गोरक्षा के कार्यों, आयोजनों एवं आन्दोलनों में उन्होंने कभी भी पंथ, गादीपती
स्थान, अपनी उम्र व स्वास्थ्य आदि संसारिक एवं संत समाजीय विशेष अधिकारों
(प्रोटोकाल), आदि का दिखावा नहीं करते हुए जब-जब आवश्यकता पड़ी और उन्हें
लगा, तब-तब पूज्यश्री स्वयं आकर उपस्थिति ही नहीं हुए बल्कि सदैव
मनसा-वाचा-कर्मणा सम्पूर्ण रूप से साथ दिया ।
शांत स्वरूप, आज के युगानुरूप व्यवस्थाओं में सत शक्तियों को पुष्ट करने में
अग्रणी रहते हुए भी समस्त प्रकार की राजनीति से समग्र रूप से दूरी, विशिष्ट से
विशिष्ट एवं आम व्यक्ति में कभी कोई भेद न करना, सम्पूर्ण सामथर्यानुसार सेवा कार्यों
में स्वयं को तत्काल उपस्थित कर देना, मानव समाज के विकास को बल देने के
लिए धार्मिक-आध्यात्मिक विशिष्ट अनुष्ठानों का आयोजन करते हुए भी सम्पूर्ण
दिखावे से दूर रहना उन्हें समयकालीन दौर में भी तथा भविष्य में भी प्रेरणामयी बना
देता है।
पुन: राष्ट्रीय कामधेनु कल्याण परिवार और श्री पथमेड़ा गोधाम महातीर्थ
परिवार का ब्रह्मलीन परम पूज्य श्री शांतिनाथजी महाराज के श्रीचरणों में कोटि-कोटि
वन्दन ।
(द्वारा श्री पूनमजी राजपुरोहित, प्रवक्ता)
स्रोत: “सबके नाथजी” पुस्तक, संस्कृति शोध परिषद्, जालोर। पुस्तक क्रमांक 17।
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