🚩 सिरे मंदिर जालोर • जय श्री नाथजी महाराज री हुक्म 🚩

उनका सानिध्य: परम सौभाग्य - पूज्य शीतलाईनाथजी महाराज

॥ जय श्री शांतिनाथजी महाराज ॥

।। उनका सानिध्य - परम सौभाग्य ।।

परम पूज्य शीतलाईनाथजी महाराज
हल्देश्वर मठ, जालोर
जलंधरनाथजी की जो गादी है, वह नवनाथों एवं 84 सिद्धों में इनका नाम
आता है। नाथ सम्प्रदाय के मुख्य 12 पीठ हैं, उनमें से शांतिनाथजी बावजी की जो
पीठ गादी है वह एक है। शांतिनाथजी महाराज सा पूरे भारत वर्ष में साधु समाज में,
खट दर्शन में सम्माननीय रहे है। मुझे याद है जिस समय हरिद्वार कुम्भ में उनके साथ
था। वहां हरिद्वार में पूज्य हरिगिरीजी महाराज जो बहुत वर्चस्व वाले महाराज हैं ।
(जूना अखाडे के) उन्होंने बावजी को अखाडे में बुलवाया एवं सम्मान करवाया। उस
समय कुम्भ में कोई चार पहिये का वाहन नहीं जा रहा था। परन्तु हरिगिरीजी के
निर्देशन एवं नारायणगिरीजी की उपस्थिति में महाराज सा के वाहन को हर की पोढी
तक ले जाना एवं वहां धुमधाम और प्रशासनिक व्यवस्था के साथ स्नान-ध्यान
करवाना, यह बडी घटना थी। इतनी बडी उपलब्धि शायद ही किसी संत को मिलती
है।
शांतिनाथजी महाराज के साथ हम जहां जहां भी रहे कुछ नया ही देखा।
दक्षिण भाग में उड़िसा जगन्नाथ धाम जा रहे थे। रात्रि में विश्राम के लिए रूके । हम
लगभग 40 संत महात्मा लोग थे। उस समय वहां काम करने वाले जो गरीब समुदाय
में खेतीहर लोग थे। उन्होंने देखा की संत मंडली बैठी है तो वे प्रणाम करने आए।
किसी के हाथ में पुष्प तो किसी के हाथ में पैसे थे। नया प्रदेश था एवं सामान्य ग्रामीण
परिवेश के लोग थे। माताएँ, बहने, भाईलोग सब थे। उनकी भाषा को हम नहीं जानते
थे। वे सीधे आए और शांतिनाथजी को प्रणाम किया। वहां बडे बडे संत भी बैठे थे।
कैलाशनाथजी हंसे और फरमाया, देखो बावसी आपने तो मनख अठै ही ओलखे है।
बावसी मुस्कुराए मैं सबका हूँ, किसी अकेले का तो हूँ नहीं। संत सर्वत्र एक जैसा होता
है । ‘‘हम भी प्रभावित हुए इन शब्दों से कि संत सब जगह एक सा होता है, उसका
कोई क्षेत्र या पक्ष नहीं होता । जाति का पक्ष नहीं होता, समाज का पक्ष नहीं होता।
साधु तो सिर्फ साधु होता है । वह पूरे विश्व का एक तरह से संरक्षक होता है ओर वही
काम महाराज जी करते थे।
आपने देखा होगा पूरे जिले में जितने भी प्राचीन मंदिर हैं सबका संरक्षण

करवाया, जीर्णोद्वार करवाया और जिले में ही नहीं जिले के बाहर भी अनेक ऐसे मंदिर
है जो शांतिनाथजी बावसी द्वारा निर्मित है। जहां जहां भी उनके चातुर्मास होते वहां
लाखो श्रद्धालु तो आते ही समस्त हमारे खट दर्शन के साधु भी आते और अन्य जो भी
पंथ सम्प्रदाय है उनके सभी साधु आते हैं। एक बार की घटना मुझे याद है, जब किसी
ने उनसे पूछा कि बावसी आपके सम्मान में कोई फर्क पड़ता है तो उन्होने बेलाग
जवाब दिया कि देखो साधु सम्मान नहीं चाहता, साधु को सम्मान और अपमान से कोई
लेना देना नहीं होता। सम्मान तो स्वत: ही होता चला जाता है। उसे तो काम में लगा
रहना चाहिए।’’
मेरा स्वयं का एक व्यक्तिगत अनुभव है। जब मैं यहां आया था। सिद्धाईनाथजी
की समाधि के बाद जो साधु गादी पर बैठाये गए थे वो भी देवलोक हो गए थे।
जंगल था। यहां कोई व्यवस्था नहीं थी। तो मैं यहां बिल्कुल अकेला महससू करता
था। मुझे जब भी भूख लगती 3-4 दिनों में आस-पास के घरों से भोजन ले आया
करता था। काफी समय बाद एक दिन बावसी से मिलना हुआ। उन्होंने स्नेह से सारी
सार संभाल पूछी फिर उन्होंने जगह-जगह मेरे प्रवचनो की व्यवस्था करवायी, जब भी
बाहर जाते तो मुझे भी बुलवा लेते और साथ ले जाते। उनकी बडी कृपा रही। एक और
अनुभव मुझे याद है। ‘‘ बावजी का चातुर्मास गांव-खण्डप (जिला-बाड़मेर) में हुआ था
तो बावजी ने मना भी किया था कि मैं जिले के बाहर चातुर्मास नहीं करूगा। मगर
भक्तो के प्रबल आग्रह एवं अगाध प्रेम कोे देखकर उन्होंने जिले के बाहर बाडमेर जिले
के खण्डप में भी चातुर्मास किया।
जिस समय मुझे यहां मंदिर का निर्माण करना था तब मैं चार पांच भक्तों को
लेकर बावजी के पास आशीर्वाद लेने गया । बावजी को कहने पर बावजी ने फरमाया
कि निर्माण तो ठीक है, पर पत्थर का मंदिर बना, बहुत बडा शिखर बंद मंदिर बना।
तब हमने कहा कि बावजी इसमे तो काफी पैसा लगेगा। तब बावजी ने एक ही शब्द
कहा ‘‘पियो रो क्युं सोच करे, थारे पाडे घणों ही पियो है (पैसे की क्यो चिंता करता है
तेरे पास तो खूब पैसा है)। इसके बाद उनके वचन सिद्ध हुए और सब प्रकार से काम
सफल हो गया। ऐसी अनेक घटनाएँ है, काफी अनुभव हैं।
एक बार मालवा से एक बडे धनवान सज्जन श्रीनारायणसिंहजी गुर्जर आए हुए
थे। उनके पोता नहीं था। हर प्रकार से चिंतित थे। उन्होंने पोते के लिए प्रार्थना की
और उन्होंने कहा कि बावजी मेरे पोता नहीं है और मैं लडके की दूसरी शादी कर रहा
हूँ। तो महाराज ने मना किया और कहा कि अब बहू के संतान हो जाएगी। उस समय
बावजी का चातुर्मास किले पर था फिर इसके बाद मुझसे कहा कि इसके
जलन्धरनाथजी रे सोमे पग्गे (इसी स्थान से) जोडी सहित प्रणाम करवा । बावजी के
आशीर्वाद से उन्हे पुत्र रत्न प्राप्त हुए। यह मेरी प्रत्यक्ष घटी-घटना है। ऐसे उनकी

यादें हमारे साथ हैं। चित्तहरणी के रास्ते सिरे मंदिर जाने की यात्रा के अनुभव भी
काफी शिक्षाप्रद रहे है। बावजी सबकी बहुत चिंता करते थे। वे विश्व की एक
महाशक्ति थे और उनका सानिध्य मिलना परम सौभाग्य की बात है।
महाराज सा शांतिनाथ जी के जीवन के सुंदर पलों के क्षणों को, दिव्य वचनों
को एवं जीवन शैली के दृश्य को जिस प्रकार सुंदर पुस्तक के रूप में संजोने का जो
सुंदर प्रयास लेखक ने किया है और बहुत ही बहुत अच्छा उनका भाव है क्योंकि
शांतिनाथजी जैसे सिद्ध पुरूष को यदि कोई अपने हृदय से भी पुकारता है तो अदृश्य
होकर भी उसे सदृश्य रूप में आशीर्वाद देते है ।
मैं लेखक को मेरी तरफ से यहीं कहुंगा कि जीवन में जो आपको सभी प्रकार से
अच्छे-अच्छे कार्य करने की संकल्प शक्ति आए और शांतिनाथजी महाराज की कृपा
से आपकी हर इच्छा पूरी हो। आपको धन धान से परिपूर्ण रखे और आपको ऐसे मंगल
कार्य करने का मनोबल दिन-दुगुना रात चैगुना बढाएं। संदीपजी को हमारा ऐसा शुभ
आशीष।
जय नाथजी महाराज की ।


स्रोत: “सबके नाथजी” पुस्तक, संस्कृति शोध परिषद्, जालोर। पुस्तक क्रमांक 22।

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