🚩 सिरे मंदिर जालोर • जय श्री नाथजी महाराज री हुक्म 🚩

परम पूज्य शांतिनाथजी महाराज के अमृत वचन और कहानियाँ

॥ जय श्री शांतिनाथजी महाराज ॥

।। श्री गुरु चरण कमलेभ्यो नम: ।।

तृतीय - खण्ड
धर्म के लिये जिए समाज के लिए जिए..........
ग्रंथ का यह भाग
सामान्य पंक्तियों का
संग्रह मात्र नहीं है।
इनमे सद्गुरु का ज्ञान है
जीवन जीने की प्रेरणा है
मां जैसे संस्कार हैं , पिता जैसा अनुशासन हैं
भाई जैसा अपनापन हैं, बहन की आत्मीयता हैं
धर्म का सम्मान हैं, धर्म की शिक्षा है ।
धर्म की रक्षा का भाव हैं।

क्योंकि
।। धर्मो रक्षति रक्षति: ।।
जो धर्म की रक्षा करता है
उसकी रक्षा धर्म करता है।

पीर श्री श्री 1008 श्री शांतिनाथजी महाराज की
अमृतवाणी
अमृत वचन-
विभिन्न अवसरों पर महाराजजी की भक्तों से हुई चर्चाओं का
यह नवनीत है। उनके अमृततुल्य सद्वचनों का यह संग्रह निश्चय
ही भाविकों को सद्आचरण करने का विवेक प्रदान करेगा।
सदैव प्रभु भक्ति में लीन रहो, मार्ग स्वत: खुलते रहेंगे,
तुम प्रभुता को प्राप्त करते रहोंगे।

मन को रखोगे साफ, तो उसमें प्रभु स्वयं विराजेगे ।

ईमानदारी व शुद्ध आचरण से कमाया धन तुम्हे सुख व समृद्धि दोनों देगा,
अन्यथा तुम गहरे भंवर में फंस जाओगे ।

कलयुग काळो नाग है, कद डसे पतो नहीं,
पर मनड़ा सदैव हरि भजन में लाग, तो पाछै किनो भी भो नहीं ।

बगैर तथ्यों को जाने, बात मत करो ।

जीवन में सुख-दु:ख की छाया आनी-जानी है ।
पर तुम सुख देख उछलो नहीं व दु:ख में हाय-हाय नहीं करो।
दोनों में सम रहो तभी तुम श्रेष्ठ मानव बनोगे।

जीवन का सच्चा आनन्द सदैव करो प्रभु नाम जप ।

मर्यादा पालन को अपने जीवन में सदैव प्रमुख स्थान पर रखो ।

स्त्री का धर्म है, वह अपनी मर्यादा का पालन करते हुए,
पति व परिवार की सदा सेवा करें ।

शरीर से अलग रहकर, शरीर व मन के हर कार्य पर दृष्टि रखो और
गलत करने पर उस पर दया मत करो । कठोर दण्ड दो।
तभी तुम अपना जीवन सार्थक कर पाओगे।

बगैर जाने हरेक व्यक्ति पर विश्वास मत करो ।

गुरु महाराज के वचनों में रहकर तुम अपना जीवन सार्थक करो ।

लकड़े की माला लेकर फेरने से जीवन सार्थक नहीं होगा ।
माला मन से फेरो। उसको नियन्ति्रत कर ध्यान करना सीखो ।

हर प्राणी में ईश्वर को देखो व उसकी मदद नि:स्वार्थ भाव से करो ।
स्वार्थी मत बनो, परमार्थी बनो ।
साधु होकर भी अपने अन्दर के साधुत्व को जागृत न किया,
तो तुम और भी अधिक पाप के भागी बनोगे ।

सही दिशा दिखा दो, मार्ग बता दो, उस पर चलने के लाभ बता दो,
फिर भी प्राणी उस पर ध्यान न दे तो वह उसके कर्मो की सजा होगी ।

बोलो कम, सुनो ज्यादा ।

भगवा रंग त्याग का, तपस्या का प्रतीक है।
उस भगवे रंग की रंगत अपने अन्तकरण में उतारो ।
फिर देखो तुम क्या से क्या हो जाते हो, अर्थात दिव्य पद प्राप्त करोगे।

हर प्राणी को आत्मा से प्रेम करो,
तुम्हें कोई बुरा व्यक्ति नहीं मिलेगा।
आत्मा परमात्मा है। जो उससे स्नेह करेगा उसे आत्मा
कभी कष्ट पहुचाने का नहीं सोचेगी।

जीवन के अन्त में कुछ साथ नहीं चलेगा, मात्र प्रभु नाम व संसार में आप द्वारा किया गया
श्रेष्ठ कार्य। जिसे लोग याद करके तुम्हे याद करेंगे, अत: श्रेष्ठता की ओर बढो।

ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान ध्यान से निवृत हो भगवान का भजन करोंगे,
तो रोग तुम्हे कभी नहीं छूएगा ।

घर की लक्ष्मी वही स्त्री है जो प्रात: जल्दी उठे व पूजा पाठ कर घर का कार्य करे।
उस घर में कभी अन्न, धन, वैभव की कमी नहीं आएगी ।

प्रात: भोजन बनते ही विष्णु भगवान को (अग्नि देवता के) धूप लगाकर ,
गाय-कुते की रोटी अवश्य निकालें ।

सहजता, सात्विकता, स्नेह, सद्भाव, आदि अपने मूलभूत गुणों को कभी मत
छोड़ो अर्थात अपने गुणों में वृद्धि करो । उनमें किसी भी कारण से कमी मत आने दो ।

ईश्वर द्वारा प्रदान प्राकृतिक सम्पदा का दुरुपयोग मत करो।
प्रकृति से आत्मीयता से जुड़ते हुए, उससे खूब स्नेह प्रेम करो ।
फिर देखो तुम्हे कितनी आत्मिक शांति व आनन्द प्राप्त होते हैं ।

अपने से बड़ों का सम्मान करो,
माता-पिता की आज्ञा में रहकर उनकी सेवा करो।
विश्वास रखो, तुम कभी दु:खी नहीं होओगे,
तुम्हे कभी किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं छुएगाँ।।

माता, पिता, गुरु महाराज की सेवा ही तुम्हें,
संसार के भंवर से पार कराने की ताकत रखती है ।

मन को पकड़ कर सदैव प्रभु भजन में लगाओ,
मन को पकड़ना पानी को पकड़ने के बराबर है,
पर निरन्तर अभ्यास से यह संभव है।

सदैव दान करो, दया करो, लेने का भाव मत रखो ।

वैज्ञानिक युग में, विज्ञान द्वारा दिए गए साधनों का हम उपयोग भले ही करते है,
पर उसका नुकसान हमें ही उठाना पडेगा।
अत: अपनी प्राचीन परम्पराओं को मत छोड़ो।
ये परम्पराएं अपना गौरव हैं।
अपने गौरव और स्वाभिमान को छोडकर कभी कोई सुखी नहीं हुआ ।

मनुष्य मात्र को सम्मान दो ,हर मानव मन के भावों को समझो,
किसी को भी उच्च या निम्न मत समझो ।’’

तुम जैसे-जैसे उच्चता की ओर बढो,
वैसे-वैसे अपने में विनम्रता व सादगी के भाव को और बढाते रहो।
तभी तुम सफल हो सकोगे ।
जाति धर्म को लेकर अन्तर मत करो। सभी का सम्मान करो। यथा योग्य मान दो ।

जो जीवन भर शान्त रहता है,
उनके जीवन का अन्तिम समय सुखद व ध्यान प्रभु चरणों में रहता है ।

भक्ति का पुण्य मानव मन में बचपन से खिलता है।
तभी वह जीवन को सार्थक करता है।
उम्र बढने के बाद भक्ति करना, इसमें मन लगाना, कठिन होता है।
अत: हर मानव में बचपन से भक्ति का पुष्प खिले, ऐसा प्रयास करना चाहिए ।

हे संतजनों जो तुम समाज से लेते हो, या समाज तुम्हे जो भेंट करता है,
उसे समाज उत्थान व धार्मिक कार्य में खर्च करने का, उससे कई गुना अधिक
समाज को लौटाने का सामथर्य हो तो समाज द्वारा दी भेंट स्वीकार करो,
नहीं तो मत लो क्योंकि सामथर्य बिना लिया दान तुम्हें और अधिक
कर्म बन्धन मे बांध देगा जिससे छूट पाना नामुमकीन है ।

मानव अकेला आया है, अकेला जाएगा।
उसके साथ मात्र भक्ति व उसके द्वारा समाज में किया गया सद्कार्य साथ चलेगा ।

ईश्वर प्राप्ति के लिए निरन्तर भजन का अभ्यास आवश्यक है,
तभी प्रभु के दर्शन सम्भव हैं अन्यथा नहीं ।

सदैव अपनी सांसो पर ध्यान केन्दि्रत रखो,
ओर प्रभु नाम का जप करो, तुम्हें जीते जी मोक्ष की प्राप्ति हो जाएगी ।

साधु वही जो सत्यभाषी, पर मधुर वचनों का प्रयोग करे,
जिसकी कथनी व करणी में अन्तर न हो
जो प्रमाणिकता के साथ शास्त्रों का ज्ञान रखता हो,
वही सच्चा साधु है, सच्चा संन्यासी है ।

प्रत्येक मनुष्य तीन ऋणों से बंधा है उनसे मुक्त होकर ही
मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है। वे ऋण हैं-
1. पितृ ऋण, 2. देव ऋण, 3. ऋ़षि ऋण, इन तीनो ऋणों से मुक्ति का उपाय है-
1. पितृ ऋण - गाय को चारा देना, चिड़िया आदि को चुग्गा डालना ।
2. ऋषि ऋण - प्रात: जल्दी उठकर माला फेरना व सेवा करना ।
3. देव ऋण - दान पुण्य करना, नित्य हरि भजन करना, यज्ञ हवन, पूजा पाठ द्वारा ।’’

प्रत्येक मनुष्य को अपनी आय का दसवां भाग आवश्यक रूप से दान करना चाहिए,
क्योकि यह हिस्सा भगवान का होता, है अत: उन्हें अर्पण करना चाहिए।
अन्यथा बीमारी आदि में ही वह पैसा डालना अर्थात खर्च करना पड़ता है ।

बालको का शिक्षण सदैव मातृभाषा में होना चाहिए। अंग्रेजी पढ़ाओगे तो वे
अंग्रेज जरूर बनेंगे, आपके बेटे-बेटी नहीं रहेंगे। उनमें अपने मूलभूत संस्कारों
का पूर्ण अभाव होगा। अत: अपनी सभ्यता संस्कृति को पुष्ट करे, ऐसा शिक्षण
बालक/बालिकाओं के देवें ।

सदैव सहज व सरल बने और अपने दोषो पर सजग दृष्टि रख,
उन्हे समाप्त कर गुणों का विकास करने का कार्य
अपने अन्तर मन में सदैव करते रहे ।

व्यक्ति के व्यक्तित्व का मूल्यांकन उसके गुणों से करो,
न कि बाहरी सौन्दर्य के आधार पर ।

श्राद्ध पक्ष अशुभ नहीं होता है। यह पक्ष अत्यन्त शुभ है, क्योंकि इस समय हमारे
द्वारा किया गया दान, पूर्वजों के लिए किया गया कर्म, हमारे घर के पितृ देवता का
सन्तुष्ट करता है। उनके द्वारा दिये गए आशीर्वाद हमें सुख,सम्पन्नता व स्मृद्धि
प्रदान करता है। अत: इस पक्ष में खुले मन से दान पुण्य करना चाहिए,
अपने पूर्वजों को सतुन्ष्ट करना चाहिए, जिससे तुम सुखी होओगे।

स्त्री के तीन रूप होते हैं-एक कालका के रूप में, दूसरा लक्ष्मी के रूप में
व तीसरा सरस्वती माँ के रूप में । इन तीनों रूपों में से तुम (स्ति्रयाँ) लक्ष्मी व
सरस्वती माँ का रूप बन अपने घर परिवार को संस्कारवान बनाओ
ताकि तुम अपने मातृत्व ऋण से मुक्त हो सको।

भगवा वेश, जटा, तिलक आदि लगाने मात्र से तुम साधु नहीं बनोगे,
इन सभी की मर्यादा को अपने जीवन में उतारकर उस अनुसार जीवन
जीने पर ही जीवन को सार्थक करोगे। ऐसा न किया तो मानव मात्र में भगवा वेश के
प्रति अविश्वास पैदा कर तुम सात भव तक नरक में जाने का अपने लिए
मार्ग खोल दोगे। अत: साधु जीवन की मर्यादा का पालन कर सको तो ही
साधुत्व धारण करो अन्यथा कोई जबरदस्ती नहीं हैं ।

कठोर शब्दों का प्रयोग मत करो, हो सके तो प्रेम व स्नेह भरे शब्दों का
प्रयोग करो अन्यथा मौन रहो ।

अधिक से अधिक वृ़क्ष लगाओ, पर पुराने वृक्षों को काटों मत।
उन्हें वे जब तक जीए जीने दो ।

अन्ध विश्वासो में मत फंसो । ईश्वर की आराधना करो व सभी का भला करते हुए
शास्त्रानुसार नियमों का पालन करते हुए जीवन बिताओ, तुम्हे कोई कष्ट नहीं होगा ।
पूजा व्रत करो तो उसे पूर्ण विधि-विधान से करो, अन्यथा मत करो ।

अपने अमूल्य समय का प्रत्येक क्षण प्रभु भजन व समाज कल्याण में
व्यतीत करने से जो आंनद मिलता है, उसके बाद कोई भी क्षण ऐसा
नहीं बचता, जब हमें पछतावा हो ।

अपनी आत्मा की आवाज पर सदैव ध्यान दो।
मन इसके विपरीत चलेगा मगर निजी विचाराधारा की पकड़ खोने पर,
समाज में तुम्हारे व्यक्तित्व का महत्व खत्म होने लगेगा,
क्योंकि आत्मा सदैव उन्नति व परिश्रम का सच्चा मार्ग बताएगी,
जबकि मन काम चोरी व बाहरी दिखावे की तरफ ध्यान आकर्षित करेगा
जो तुम्हे समाज में मात्र कठपुतली बना देगा ।

जिसने ईश्वर की दया और प्रेम के तत्व रहस्य को जान लिया है,
उसके (हृदय में) शान्ति और आनन्द की सीमा नहीं रहती ।

आत्म-विश्वास, आत्म-ज्ञान और आत्म संयम केवल यही तीन,
जीवन को परम शक्ति सम्पन्न बना देने के सफल साधन हैं ।

प्रवचनों के माध्यम से कोई कितना ही प्रयास क्यों नहीं कर ले, लेकिन
तब तक वो सार्थक नहीं होता जब तक कि प्रयास करने वाला स्वयं
उस बात को जीवन में अपने आचरण में नहीं उतारता।

सदैव धर्म ग्रन्थों का अध्ययन करो, अपने घरो में नित्य उनकी पूजा करो ।

ज्ञान और दान उसी पात्र को दो , जो उसके योग्य हो। अन्यथा मौन रहो ।

मौन रह कर अपने अन्त: (अन्तर) मन की क्रिया विधि पर ध्यान केन्दि्रत करो,
हर श्वास को प्रभु के स्मरण में लगाओ ऐसा अभ्यास करते रहो ।

सच्चा सुख हरि भजन में, बाकी सब बेकार ।

पूज्य महाराज जी की कथाएँ

कहानी कथन की परम्परा अपने देश मेंं
बहुत पुरानी है। प्राचीन काल से ही दादी, नानी,
गुरुजी की कहानियों सेे नयी पीढ़ियाँ संस्कार
पाती रही हैं। जब से कहानी और लोरी का स्थान
टी.वी. के धारावाहिकों एवं फिल्मों ने लिया हैं तब
से समाज में संस्कारों की दुर्गति ही हो रही है।
आज स्कूलों में जो पढ़ाया जा रहा है, वह शिक्षा
नहीं है वरन साक्षरता एवं सूचनाओं का भंड़ार
मात्र है । सच्चा शिक्षक अपने आचरण से शिक्षा
देता है और विविध दृष्टातों के माध्यम से कठिन
बात को स्पष्ट करता है।
वैदिक काल में भी ज्ञान श्रुति आधारित
था अर्थात गुरु जो ज्ञान देते शिष्य उनका श्रवण
करते , कंठस्थ करते, हृदयगम करते एवं जीवन
में उतारते और वैसा ही आचरण करते। आचरण
की शिक्षा देने के कारण ही उन्हें आचार्य कहा
जाता था। कहानी कथन अपने देश में शिक्षा,
संस्कार एवं इतिहास कथन का सशक्त माध्यम
रहा है।
पूज्य बावजी सच्चे सद्गुरू थे। अपने
शिष्यों-भक्तों को समझाने का तरीका भी अद्भुत
था। विषय को इस प्रकार रोचक तरीके से स्पष्ट
करते कि भक्त स्वयं समझ जाए । महाराजजी
को अनेक कहानियाँ याद थी। अनेक वैदिक
पौराणिक कथाएँ भी उन्हें याद थी। ऐसी ही कुछ
ज्ञानवर्धक कथाएं जो उनके भक्तो से प्राप्त हुई
है, यहां प्रस्तुत हैं।


स्रोत: “सबके नाथजी” पुस्तक, संस्कृति शोध परिषद्, जालोर। पुस्तक क्रमांक 24।

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