🚩 सिरे मंदिर जालोर • जय श्री नाथजी महाराज री हुक्म 🚩

बिनु पग चले, सुन बिनु काना - श्री हिंगलाज दान चारण

॥ जय श्री शांतिनाथजी महाराज ॥

।। भक्तों की भावांजलि ।।
बिनु पग चले, सुन बिनु काना......

- श्री हिंगलाज दान चारण, नांदिया (बागोड़ा)
परदे पर फिल्म की तरह तैर रही हमारी जिंदगी में कभी कभी ऐसे चमत्कार
घटित हो जाते हैं, जिनके बारे में हमने सपने में भी नहीं सोचा होता है । वैसे तो इस
जीवन रूपी सफर में बहुत से मुसाफिरों से मुलाकत होती है, लेकिन क्या आपने कभी
किसी देवदूत से मुलाकत की है ? क्या आपने कभी भगवान का साक्षात्कार लिया है ?
शायद आपके पास इन प्रश्नों का उत्तर ना हो, लेकिन यकीन मानिए मेरे पास इन
प्रश्नों के जवाब हैं? शायद मैं दुनिया के उन तमाम खुशनसीब लोगों में एक हूँ, जिन्हें
कभी न कभी किसी देवदूत के पास बैठने का मौका मिला है। वो अभूतपूर्व व
अविस्मरणीय दृश्य आज भी मानस पटल पर इस तरह अंकित है, जैसे यह कल की
ही बात हो।
अब जरा इस पिछले सफर की बात कर लेते हैं। वैसे तो पत्रकारिता जीवन
की शुरूआत राजस्थान पत्रिका से हुई, लेकिन यह सौभाग्य मेैंने दैनिक भास्कर में
काम करते हुए पाया। इन दोनों ही अखबारों में काम करते समय कई संतों,
राजनेताओं, धर्म गुरुओं, विद्वानों से मिलने का मौका मिला, लेकिन जालोर के
भगवान कहे जाने वाले पीर शांतिनाथ जी महाराज से हुई मुलाकात से ज्यादा पवित्र,
आत्मीय, सुंदर व अलौकिक मुलाकात कोई नहीं थी। बात सन 2008 की है। जालोर
में काम करते समय नाथजी महाराज के खूब चर्चे सुने थे। हालांकि यह मेरा दुर्भाग्य
ही था कि इतने साल जालोर में रहने के बाद भी मैं उनके चरण स्पर्श नहीं कर पाया
था। लेकिन कहते हैं कि समय से पहले और भाग्य से ज्यादा कुछ नहीं मिलता है।
वैसे इस लेट-लतीफी का मलाल तो मुझे ताउम्र रहेगा। खैर एक दिन मैंने सिरे मंदिर
जाने का मानस बनाया, वह सोमवार का दिन था। हालांकि महीना सावन नहीं था।
चढाई करते समय मन में कई प्रश्न पैदा हो रहे थे। इतनी बड़ी विभूति साक्षात शिव
का अवतार, क्या पूछूंगा ? क्या परिचय दूंगा? कैसे उनसे बात करूंगा? पानी के
बुलबुलों की तरह दिमाग में आने वाली कुछ शंकाए भी क्षण भर के लिए मन को भारी
कर रही थी। याद भी आ रहा है। राजा, जोगी, अगन, जल ज्यारी उलटी रीत,
डरता रह्यो परशुराम थोड़ी पाळो प्रीत । मेरी चढाई जारी थी। मौसम भी आज मेरा
साथ दे रहा था। आसमान साफ था। ठंडी बयार चल रही थी। भक्ति व श्रद्धा से
ओतप्रोत में अपनी ही धुन में चला जा रहा था। कंचनगिरी पहाड़ उस समय कैलाश
पर्वत सा अहसास करा रहा था। यही कोई दिन के साढे़ ग्यारह बजे मैंने अपनी चढ़ाई
खत्म की । अब मैं मंदिर के सामने था । मैंने हाथ मुंँह धोए व मंदिर की ओर चल

दिया । भगवान शिव के दर्शन करने के बाद मेरी आंखें नाथजी महाराज को खोजने
लगी। इतने में एक शिष्य से मुलाकात हुई । परिचय देकर नाथजी के बारे में पूछा।
पीछे आने का इशारा किया। चंद ही मिनट में साक्षात शिव के अवतार मेरे सामने थे।
हाथ में चिलम, गर्दन जरा टेढ़ी और एक आंख आधी बंद। उनके पास दो श्रद्धालु बैठे
थे। मैंने चरण स्पर्श किया और उनके सामने बैठ गया । मुझे अभी भी याद है जितना
आत्मिक सुकून मुझे उस समय मिला, आज तक किसी भी मंदिर में नहीं मिला है। मैं
अपलक उन्हें निहार रहा था। कितनी सादगी । कितना तेज । न मठाधीशों वाला
रूतबा। न कोई आडम्बर। उन्हें देखा तो संत की परिभाषा भी समझ में आ गई। मुझे
कबीर याद आ गए ना काहू से दोस्ती ना काहू से बेैर। कुछ समय बाद वे भक्त चले
गए। अब यह भक्त अपने भगवान के सामने था। यह मेरा पहला दर्शन लाभ था।
उन्होंने सहज अंदाज से पुछा कुण है भाई ! मैंने अपना संक्षिप्त परिचय दिया मेरे
परिवार के बारे में जानकारी ली। वे संतुष्ट हुए । उन्होंने पूछा था अखबार वाला का
करो? कणरा-कणरा फोटू छापो ? नी बोलू तोई लखो। ओपोरा फोटू बीजा कोई नी
छापणा। थूँ आज मत लखजी भाई। इन्हें अखबरबाजी का शौक नहीं था। अक्सर
हमारे फोटो जर्नलिस्टों को फोटो का मना ही करते थे। अखबार के प्रति उनकी
बेरुखी देख मैंने साक्षात्कार का इरादा बदला । सिर्फ साधारण बातें ही की। नाथजी
ज्यादा नहीं बोलते थे, यह बात सब जानते थे लेकिन उस दिन उन्होंने मुझसे काफी
बात की। ज्ञान दिया कि माया दीपक, नर पंतगा। संसार मायाजाल है। शिक्षा दी कि
जरूरतमंदों की सहायता करो, दान पुण्य करो, नित्य पूजा पाठ करो। बातों का
सिलसिला कोई घंटें भर तक चला। इतने में कुछ भक्तजन आ गए । मैंने जाने की
इजाजत मांगी तो प्रसादी हाथ में देते हुए कहा-आवतो रेजे भाई, महादेव भली
करी। इसके बाद मैं उनसे कई बार मिला । उनसे हुई अंतिम मुलाकात का मैं यहां
जिक्र करना चाहूंगा। यह बात 2011 की है। वरिष्ठ अध्यापक परीक्षा की तैयारी के
लिए मैं जोधपुर में ही रहा था। एक दिन मित्र तरूण गहलोत के साथ एमडीएम
अस्पताल के आगे होकर गुजर रहा था कि अचानक नाथजी की गाड़ी दिख गई।
जाकर देखा तो नाथजी गाड़ी में बैठे थे। वे बीमार थे और किसी जांच के लिए आए
थे। जाकर प्रणाम किया। तो पूछा - अठे का करे? मैंने परीक्षा की बात बताई तो क्षण
भर रूके और कहा - सब ठीक वेई । उनका आशीर्वाद फलीभूत हुआ और मेरा चयन
हो गया। फिर एक ऐसा भी दिन आया जिसके बारे में किसी ने नहीं सोचा था।
संदीपजी का संदेश-मिला जालोर हुआ अनाथ, चले गए पीर शांतिनाथ । मैं स्तब्ध
था। जड़वत ! शून्य ! दिमाग में विचारों का प्रवाह थम गया। कुछ समझ में नहीं आ
रहा था कि क्या करूं ? दिव्य ज्योति महाप्रकाश में लीन हो गई थी। माफ करना अब
आगे नहीं लिख संकूगा। गला भर रहा है।
अक्षर भी नहीं शब्द भी नहीं, वाणी का साथ।
अब नहीं लिखा जाता नाथ, कांप रहे हाथ।।


स्रोत: “सबके नाथजी” पुस्तक, संस्कृति शोध परिषद्, जालोर। पुस्तक क्रमांक 42।

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