🚩 सिरे मंदिर जालोर • जय श्री नाथजी महाराज री हुक्म 🚩

गुरु से बड़ा कोई नहीं - श्री सुरेन्द्रसिंह पंवार

॥ जय श्री शांतिनाथजी महाराज ॥

कथा-1
गुरु से बडा कोई नहीं

सितम्बर-अक्टूम्बर 2006 की बात है। महाराजजी रात्रि के समय अखाडे में
अपने कमरे में आसन पर विराजमान थे। महाराज श्री की सेवा में भक्तगणों की सभा
बैठी थी। महाराज श्री के आसन के पास श्री 108 श्री शीतलाईनाथजी महाराज, भी
बिराजे हुए थे। उस समय कुछ भक्तगण गांव से महाराज श्री के पास पधारे और
अपने आने के उद्देश्य को बताकर बातचीत कर रहे थे। उनके द्वारा महाराज श्री के
सम्मान में भगवान, महादेव, दाता आदि शब्दों का बार-बार वार्ता करते हुए सम्बोधन
हो रहा था। जब वे अपनी बात पूरी कर महाराज श्री से आज्ञा लेकर चले गये तब श्री
108 श्री शीतलाईनाथजी महाराज ने महाराज श्री से पूछा कि ‘‘ लोग आपको
भगवान, झाड़ी रा नाथ, महादेव आदि क्यों कहते है ?’’ प्रश्न सुनकर महाराज श्री
केवल मुस्करा दिये व कुछ मौन रहकर फिर बोले कि देख भई शीतलनाईनाथ
अणरोे कारण तो मने ठा नी। मु तो कनेई नी केवतो के मने थे भगवान या महादेव
या दाता आदि के वो। अणो कारण वे इज जोणे। फिर महाराज श्री ने कुछ देर मौन
रहकर कहा कि ‘‘ एक बार एक सन्त ने एक चेला (शिष्य) बनाया और उसे ईश्वर
प्राप्ति व भक्ति के मार्ग पर चलने के बारे में ज्ञान दिया और अपने आश्रम में रखा।
सन्त के मन में आया कि चेले की परीक्षा ली जाये कि वह किस स्तर का है। एक दिन
दोनो बैठे हुए थे व सन्त महाराज ने प्रेम से अपने शिष्य से पूछा कि ‘‘ मैं तुझे कैसा
दिखता हूँ’’ चेला अभी अज्ञानी व मूर्ख था। उसने सपाट जबाव दिया कि आप तो गधे
जैसे दिखते हो। सन्त महाराज मुस्करा दिये। उन्होंने चेला से कुछ नहीं कहा और
मन ही मन समझ गये कि यह अज्ञानी है ओर इसमें किसी को परखने का ज्ञान नहीं
है। पश्चात सन्त महाराज उसे अपने साथ लेकर तीर्थाटन को निकल पडे़े। अनेक
तीर्थो का भ्रमण करते हुए अपने शिष्य को भी जगह-जगह घुमाते हुए प्रत्येक तीर्थ के
बारे में बतलाते । उसके महत्व को बतलाया और लोगों में उन तीर्थो, स्थानों के महत्व
की आस्था को भी बतलाया। इस प्रकार तीर्थाटन करते हुए वापस अपने आश्रम में
पधारे और पुन: शिष्य की परीक्षा लेने हेतु प्रश्न किया कि ‘‘ बेटा बतलाओ, मैं तुम्हें
कैसा दिखता हूँ ? शिष्य विनम्र भाव से बोला कि आप तो आदमी जैसे दिखते हो।
सन्त महाराज को थोड़ा सन्तोष हुआ कि चलो इसमे गधे से आदमी जैसा दिखने का
भाव तो जगा। पश्चात समय गुजरता गया और सन्त महाराज ने एक दिन अपने चेले
से कहा, चल बेटा, हरिद्वार में कुंभ का आयोजन हुआ है, अत: कुंभ का स्नान करने
हरिद्वार चलते है। चेला भी खुश हुआ कि तीन-चार वर्षों से आश्रम में ही जमे हुए है
अत: यात्रा का आनन्द आएगा व अनेक जगहें देखने को मिलेगी। इस प्रकार गुरू व

चेला दोनों कुंभ स्नान करने हरिद्वार रवाना हुए। बीच रास्ते में गुरुजी विश्राम हेतु
आश्रमों में रूकते । वहां शिष्य ने अपने गुरुजी की आवभगत व उनको मिलने वाले
मान-सम्मान को देखा। शिष्य के मन मे अपने गुरुजी का ‘‘वास्तविक रूप’’ जगने
लगा। जब वे कुंभ के मेले में पहुचे तो वहां सन्त महाराज से अनेक महान सन्तों को
मिलते हुए व अपने गुरु को उनके द्वारा प्राप्त मान-सम्मान को शिष्य ने देखा। साथ
ही अपने गुरुजी को अनेक शास्त्रों आदि के बारे में ज्ञान चर्चा करते हुए देखकर शिष्य
की आँखें आश्चर्य से फटी की फटी रह गई। जब सन्त महाराज रात्रि में विश्राम के
लिए पधारे तो वह शिष्य आत्मग्लानि व शर्म से भर गया और रोते हुए अपने गुरुजी के
चरणों में पड़कर अपनी की हुई धृष्टता के लिए क्षमा मांगते हुए कहने लगा कि आप
तो साक्षात ईश्वर है। मैं अज्ञानी आपको नहीं जान सका और न जाने अज्ञानतावश
आपको क्या-क्या कह दिया। आप मुझे क्षमा करो। आप इतने महान हैं जो मुझ
अज्ञानी को इतने वर्षों तक अपने साथ रखकर मेरी पशु प्रवृत्ति को मिटाया और
सत्यता के दर्शन करवाए। आप तो साक्षात ईश्वर हैं। मेरी गलतियों को क्षमा करते
हुए मुझे एक अच्छा इंसान बनाया। मैं आपके शरणागत हूँ। सन्त महाराज ने प्रसन्न
होकर अपने शिष्य को गले लगाते हुए कहा कि आज मेरी तपस्या पूरी हुई। अब
संसार में मेरे जो कार्य अधूरे रह गये हैं, उसे अब तुम पूरा करना।
दृष्टान्त सुनाकर महाराज श्री ने, शीतलाईनाथजी महाराज से कहा कि मैं
जिसको जैसा दिखता हूॅं वे लोग (भक्तगण) मुझे उस रूप से सम्बोधित करते है। अब
तुम बताओं मैं तुम्हें कैसा दिखता हूँ ? श्री 108 श्री शीतलाईनाथजी महाराज ने हाथ
जोड़ने हुए दाताश्री से कहा कि बावसी आज मुझे भी इस बात का ज्ञान हुआ कि
आपके भक्तगणों व जनमानस में आपकी क्या छवि है। मुझे मेरे प्रश्न का उत्तर मिल
गया हैं ? आप मुझे क्षमा करें।
परम आदरणीय श्री गुरु महाराज की वार्ता को सुनकर मुझे भी उस दिन इस
बात का ज्ञान हुआ कि इस मायारूपी संसार में हम लोग केवल मनुष्य या सन्तगणों
के बाहृय रूप को ही देखकर उनके गुण-अवगुणों को देखते है। जब तक हमारे
अन्दर के चक्षु नहीं खुलते तब तक हम अज्ञानी ही रहते है। अत: यह पूर्ण सत्य है कि
श्रेष्ठ गुरू ही हमें वह दृष्टि प्रदान करते हैं। हमें इस संसार के भव सागर से पार
उतरने में वे केवट बनकर हमारी जीवन नैया को जन्म मरण से मुक्त कर मोक्ष प्रदान
करने का मार्ग दिखाते हैं। मैं अपने आपको बहुत ही भाग्यशाली मानता हूँ कि ऐेसे
महान दिव्य महापुरूष ने अपने चरणों में रखकर सेवा करने का स्वर्णिम अवसर प्रदान
किया। आज वे जन-जन के हृदय स्थल में समाहित हैं एवम सही मार्ग पर चलने की
प्रेरणा प्रदान कर रहे हैं। भले ही सशरीर वर्तमान में वे नहीं हैं परन्तु प्रेम व श्रद्धा से
स्मरण करते ही ऐसा आभास होता है कि वे मेरे पास ही हैं।
- सुरेन्द्रसिंह पंवार


स्रोत: “सबके नाथजी” पुस्तक, संस्कृति शोध परिषद्, जालोर। पुस्तक क्रमांक 25।

Post a Comment

0 Comments