🚩 सिरे मंदिर जालोर • जय श्री नाथजी महाराज री हुक्म 🚩

शिव आराधना

॥ जय श्री शांतिनाथजी महाराज ॥

।। श्री गुरु चरण कमलेभ्यो नम: ।।

सप्तम - खण्ड
शिव आराधना....
आदिकाल से ही नाथ सम्प्रदाय के जुडे़
भक्तजन भगवान शिव की आराधना करते रहे हैं।
पूज्य शांतिनाथजी महाराज भगवान शिव के परम
भक्त थे।
उनके आस-पास का वातावरण एवं
आभामंडल भी शिवमय था। वे सदैव शिवमहामंत्र की
आराधना करते रहते थे। उनके समीप बैठने वाले
दिव्य भक्तों का भी यह अनुभव है कि महाराजजी के
समीप बैठते ही श्वास-प्रश्वास से ऊँ नम: शिवाय का
जाप स्वत: प्रारम्भ हो जाता है।
भगवान आदिनाथ महादेव के पावन स्मरण
के बिना तो यह पुस्तक सदैव ही अधूरी रहती, अत:
हम सब भक्तों, श्रद्धालुओं के परम कल्याण के लिए
भगवान शिव की कुछ महत्वपूर्ण स्तुतियाँ, स्त्रोत इस
पुस्तक में प्रस्तुत हैं।

।। जय नाथजी री सा ।।

।। शिव पंचाक्षर स्त्रोत ।।

।। ऊँ नम: शिवाय ।।

।। शिव मानस पूजा ।।

।। ऊँ नम: शिवाय ।।

।। शिवाष्टकम ।।

।। इति शिवाष्टकम सम्पूर्णम ।।

।। शिव तांडव स्तोत्रम ।।

।। इति श्री दशानन विरचितं शिवताण्डवस्तोत्रं सम्पूर्णम ।।

।। लिंगाष्टकम ।।

।। इति श्री लिंगाष्टकस्तोत्रं सम्पूर्णम ।।

।। रूद्राष्टकम ।।

।। इति श्री गोस्वामी तुलसीदासकृतम श्रीरूद्राष्टकं सम्पूर्णम ।।

।। रूद्र स्तवन ।।

।। दारिद्रयदु:खदहनस्तोत्रम ।।

।। ऊँ नम: शिवाय ।।

।। शिव चालीसा ।।

।। ऊँ नम: शिवाय ।।

अथ ज्ञान गोदडी प्रारम्भ
सत नमो आदेश! गुरूजी को आदेश ।। ऊँ गुरूजी । ।। गोदडी ।।
श्री नाथ कहे दो अकर जोरी यह संशय मेटोप्रभु मोर, काया गोदडी का,
बिस्तारा ता से हो जिवन निस्तारा आदी पुरूष इच्छा उपजाई, इच्छा सख्त निरंजन
माही, इच्छा ब्रह्मा, विष्णु, महेशा, इच्छा शारद गौरी गणेशा इच्छा से उपजा
संसारा-पांच तत्व गुण तीन पसारा, अलग पुरुष जब किया विचार लक्ष चैरासी
धागाडारा पाॅच तत्व की गोदडी बीनी, तीन गुणो से ठाडी कीनी, तो में जिवन ब्रह्म है
माया, सद्गुरू ऐसा खेल बनाया सींवन पाॅच पच्चीस सो लागे काम क्रोध मद मोह
त्यागे, अब काया गोदडी का विस्तारा देखो संतो अगम-अपार चन्द्र सुर्य दोऊ
चंदोआ लागे, गुरू प्रताप से सोवत जागे, शब्द की सुईसुरति का डोरा, ज्ञान का
टोपा निरंजन ओढा इस गोदडी की कर होशयारी दाग न लागे देख विचारी सुमति
के साबुन सतगुरू धोई, कुमति के मैलको डोर खोई जिन गुदडी का किया विचारा
उसको भेंटे सिरंजन हारा, धीरज धुनी ध्यन धरे आसन, जतकि कोपीन सत्य
सिंहासन युक्ति कमण्डल करके लीना, प्रेम फावडी सत गुरू चोना सेली शीले विवेक
की माला, दया की टोपी तन धर्मशाला मेहत मतगा मति व साखी मृगछाला मन ही
की राखी निष्ठा धोती पवन जनेऊ अजपा जपे सो जाने भेऊ रहे निरन्तर सद्गुरू
दाया साधो की संगत में कुछपाया लय की लगोटी हृदय की झोली क्षमा खडाऊँ
पहिर बहोरी मुक्ति मेंखला सुकृत सुमरनी प्रेमप्याला पीले र्मीनी दास कूबरी कलह
निवारी ममता कुत्ती को ललकारी यतन जंजीरा बान्धा जो राखो अगम अगोचर
खिडकी लाखे वीतराग वैराग्य निधाना, तत्व तिलक दोनो निर्वाना गुरूगम चकमक
मनसम तुला, ब्रह्म अग्नि प्रगट भई मूलासशय शोक सकल भ्रम जारे पाॅच पच्चीसो
प्रगट मारे दिल के दर्पण दुविधा धोई सो योगेश्वर पक्का होई, सुन्न महल की फेरी
देई अमृत रस की भिक्षा लेई सुख दु:ख मेला जग का भावे त्रिवेणी के घाट नहावे तन
मन खोज भया सब ज्ञाना तब लख पाने पद निर्वाना अष्ट कमल दल चक्र सुझे योगी
आप आप में बुझे इण्डा पिडाला के घरजाई सुषुम्ना नीर जटा ठहराई ऊँ सोहम तत्व
विचारा बंकनाल में किया संभारा, मनसा मार्ग गगन चढजाई मानसरोवर बैठे नहाई
छूट गई कल्यष मिले अलेखा इन नैनो से अलषको देखा, अहंकार अभिमान विदारा
घट में चैका किया उजियारा श्रद्धा चंवर प्रीति की घुपा, निष्ठा नाम गुरू का रूपा
अनहद नाद नाम की पुजा ब्रह्म वैराग्य नहीं दुजा चितका चन्दन तुल्सी फुला,
हितका सनमुख करले मुला, गोदडी पहरी आप अलेषा, जिसने चलया प्रगट भेषा जो
गोदडी को पढे प्रभाता जन्म-जन्म, का पातक जाता जो गोदडी को पढे मध्याना सौ
नर पावे पद निर्वाना सन्ध्या सिमरण जो नर करे जरा मरण भव सागर तरे जो
गोदडी की निन्दा करे, षट दर्शन से वह नर तरे कहे मत्स्येन्द्र सुनो गोरक्षनाथ ज्ञान
गोदडी करे साॅवल श्री नाथजी गुरूजी को आदेश-आदेश आदेश

श्री गणेशाय नम:, हरि ऊँ नम:शिवाय, श्री जलन्धरनाथजी साय छै श्री
रत्नेश्वर महादेव की जय ।
ऊँ गंगे हर-हर नर्मदे हर-हर जटाशंकर हरी ऊँ नम: पार्वती पतये हर-हर महादेव
बोलीयो श्री शम्भुजती गुरू गोरक्षनाथजी महाराज की जय । श्री माया स्वरूपी
दादामत्स्येन्द्रनाथजी महाराज की जय । श्री नवनाथ चैरासी सिद्धो की जय । श्री
भेष भगवान की जय । श्री अपने-अपने गुरू महाराज की जय । श्री सनातन धर्म की
जय । श्री अटल क्षैत्र की जय । श्री कजलीकाल भैरूनाथजी महाराज की जय । श्री
पात्रदेवता भगवान की जय । श्री ज्वाला माँ माई की जय । श्री सच्चे दरबार की जय
। श्री जलन्धर नाथजी महाराज की जय । श्री सिद्ध विचारनाथजी महाराज की जय
। श्री रत्नेश्वर महादेव की जय । श्री सुआनाथजी महाराज की जय । श्री
भवानीनाथजी महाराज की जय । श्री भैरूनाथजी महाराज की जय । श्री
फुलनाथजी महाराज की जय । श्री पुर्णनाथजी महाराज की जय । श्री केसरनाथजी
महाराज की जय । श्री अमरनाथजी महाराज की जय । श्री भोलेनाथजी महाराज
की जय। श्री शान्तिनाथजी महाराज की जय । सर्वेसन्तो की जय ।
नम: पार्वती पते हर-हर महादेव
सत नमो आदेश, गुरूजी को आदेश, ऊँ गुरूजी आदेश नाम में उठन्ते देवा
सातदिप नव खण्ड में करो आदेश नाम की सेवा आदेश नाम अनघतजी की काया
रणोकार में जणोकार आनसमाया पुष्पा प्रेम अनन्त युग मेवा आदी युगा आदी करू
तुम्हारी सेवा व्रजकरो दे अमर करो काया आदेश नामसिद्धो ने पाया आदेश नाम
पासन्तराया ब्रह्ममा, विष्णु, महेश्वर योगी आवा-गमन कभी नहीं भोगी अटल दलेचे
बैठे श्री नाथ निरंजन निराकार से करो आदेश नाम की सेवा का विचार आदेश नाम
अनघट भागी लाख चैरासी जिवा योनी पठनते राखी ऊँ सोम विध्मय प्रशोत्तम
महादेवाय धिमी तनो आदेश प्रचोदयात तवेक ऊँ कार निराकार तीन लोक में
जय-जयकार, नादवाजे, काल भागे, ज्ञान की टोपी गोरक्ष साजे गलेनाद पुष्प की
माला रक्षा करे श्री शम्भुजति गुरू गोरक्षनाथजी महाराज बाला चार-खाणी, चार
वाणी, चंदा-सुरज, पवन-पानी एको देवा सर्वत्र सेवा ज्योति पाटले परसो देवा
कानन कुण्डल गले नाद करो सिद्धो आदेश-आदेश !


स्रोत: “सबके नाथजी” पुस्तक, संस्कृति शोध परिषद्, जालोर। पुस्तक क्रमांक 51।

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