🚩 सिरे मंदिर जालोर • जय श्री नाथजी महाराज री हुक्म 🚩

स्वयं में एक प्रकाशपुंज थे पीरजी - श्री लक्ष्मीनारायण मीणा

॥ जय श्री शांतिनाथजी महाराज ॥

संस्मरण
‘‘स्वयं में एक प्रकाशपुंज थे पीरजी’’
श्री लक्ष्मीनारायण मीणा
डीआईजी, राज. पुलिस

पीरों के पीर शांतिनाथजी महाराज के महाप्रयाण से उनके भक्तों को गहरा
आघात लगा है । ऐसे ही एक भक्त है पुलिस मुख्यालय जयपुर के डीआईजी (क्राइम)
श्री लक्ष्मीनारायण मीणा। जालोर में पुलिस अधीक्षक के पद पर रहे श्री मीणा,
महाराज के परम भक्त और नजदीकी थे। उनका अखाडे़ मे नियमित जाना होता था।
वे महाराज के पास घंटों बैठे रहते थे तथा उनसे चर्चा करते थे। उनका कहना है कि
महाराजजी के महाप्रयाण से न केवल जालोर, बल्कि संपूर्ण देश के सत्संगियों और
आध्यात्मिक लोगों को अपूरणीय क्षति पहुंची है। उन्होंने महाराज के व्यक्तित्व को
विशाल बताते हुए साष्टांग प्रणाम किया। पीरजी के महाप्रयाण के बाद वरिष्ठ
पत्रकार अश्विन राजपुरोहित से हुई खास बातचीत के अंश यहां प्रस्तुत है।

मेरा जालोर में पुलिस अधीक्षक के पद पर स्थानांतरण हुआ ही था।
इस दौरान मैं लेटा मठ में दर्शन के लिए गया था। वहां लेटा महंत रणछोड़भारतीजी
महाराज ने पीरजी के व्यक्तित्व के बारे में बताया। मैंने जिज्ञासावश उनसे मिलने की
इच्छा जाहिर की तो लेटा महंतजी उसी दिन मुझे पीरजी के पास ले गए तथा उनसे
मिलवाया। ऐसे संत से मिलवाने के लिए लेटा महंतजी का मैं आभारी हूँ। पीरजी से
मिलकर परमशांति की अनुभूति हुई। उनके आभामंडल से प्रकाश झलकता था।
उनसे वार्तालाप की जरूरत नहीं होती थी। उनको देखकर ही शांति मिल जाती थी।
उनका व्यक्तित्व बहुत विशाल और भव्य था। अनंत सागर जैसा। जिसका
कोई ओर-छोर नहीं । जो आया, समा गया। वे दयावान, दानशील, और वात्सल्य से
परिपूर्ण थे। वे समदर्शी थे और सभी को बच्चों की तरह रखते थे। मैं उनको साधु नहीं
संत मानता था और मानता हूं। संत वही होता है जो सभी का होता हैं।हालांकि वे
कम बोलते थे । जब भी उनसे बातचीत होती तो इतिहास एवं आध्यात्मिक विषयों पर
चर्चा होती । परमात्मा के बारे में कभी कभी बात होती थी। इसके अलावा नाथ
संप्रदाय के बारे में चर्चा होती थी । जैसे नाथ संप्रदाय के महान योगी व तपस्वी
जलंधरनाथजी, गोरखनाथजी और मत्स्येन्द्रनाथजी आदि के बारे मे। वैसे ज्यादातर
समय वे चुप ही रहते थे। वृद्धावस्था भी एक कारण था। मैं वहां परमशांति के लिए
जाता था। वैसे पीरजी तो स्वयं अपने आप में एक चमत्कार थे। उनका व्यक्तित्व ही

चमत्कारिक था। मैंने वहां बैठकर कई उपलब्धियां पायी । मैंने बावजी के पास परम
शांति, सुख व धैर्य पाया। मुझे वहां बैठकर ऐसा लगता था कि जैसे मैं बहुत बड़े वट
वृक्ष की घनी छाया में बैठा हूँ। उन्होंने जीवन का महत्व समझाया। बताया ‘‘ पानी
केरा बुदबुदा अस मानस री जात। ’’मैं उनसे काफी प्रभावित हुआ। उनके प्रकाशमयी
आभामंडल को देखकर स्थायित्व आता था। मुझे भी ऐसा ही प्रतीत हुआ । उनसे
काफी सीखा जा सकता है। उनसे मिलकर हर रोज एक नई सीख मिलती थी।
उनसे सीखा कि जीवन में सभी के साथ समान व्यवहार करो तथा दयाभाव रखते हुए
दीन-हीन की सेवा करो। जब मेरा जालोर पुलिस अधीक्षक से डीआईजी क्राइम
जयपुर के पद पर स्थानांतरण हो गया था। तब भी जाने से पहले में अखाड़े गया था
तथा उनसे मिलकर आशीर्वाद लिया था।
पीर जी के महाप्रयाण का समाचार भी एकाएक टीवी पर मिला । टीवी पर
समाचार को देखकर आघात लगा । मुझे लगाकि एक आत्मा शरीर को छोड़कर चली
गई है। उनके महाप्रयाण से न केवल जालोर, बल्कि पूरे देश के संत-संगी और
आध्यात्मिक लोगोें के लिए क्षति है। पूरे देश ने एक महान योगी, तपस्वी और
चमत्कारिक व्यक्तित्व को खो दिया।
मैं उस महान व्यक्तित्व को साष्टांग प्रणाम करता हूं तथा कोटि-कोटि वंदन
। मैं जल्द ही जालोर आऊंगा तथा उनके समाधि स्थल पर जाकर श्रद्धांजलि अर्पित
करूंगा।

वार्ता-श्री अश्विनी राजपुरोहित
एडवोकेट, सायला ।


स्रोत: “सबके नाथजी” पुस्तक, संस्कृति शोध परिषद्, जालोर। पुस्तक क्रमांक 37।

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