॥ जय श्री शांतिनाथजी महाराज ॥
श्री राजाराम
भूमिका सह प्रान्त प्रचारक
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
जोधपुर प्रान्त
सात द्वीप नव खण्ड में, संत भरे ज्यांरी साख ।
‘‘ शांतिनाथ’’ जग अवतरया, जाग्या भगत का भाग ।।
योगीराज शांतिनाथजी भारत की गौरवशाली ऋषि परम्परा के सच्चे संवाहक
और दैवीय गुणों से युक्त साक्षात शिव के समान दिव्य आलोक व आभायुक्त प्रेरणा
-पूंज थे। उन्होंने अपनी श्रेष्ठ नाथ-गुरु-परम्परा के उच्चतम बिन्दुओं के अनुरूप
अपनी अखण्ड और अहर्निश ‘‘ शिवोपासना’’ एवं शिव तत्व की सतत साधना के
माध्यम से शिव को साक्षात स्वयं अपनेे भीतर समाहित पाया। उनकी शिव उपासना
को देखकर लगता था जैसे उनके रोम-रोम में ‘शिवोऽहम-शिवोऽहम’ की पवित्र मंत्र
ध्वनि प्रस्फुटित हो रही हो। सांसारिक जगत के समस्त आकर्षणों से दूर उनका
वैरागी मन सदैव परम तत्व की अखण्ड साधना में लीन रहा ।
राम जन्म भूमि, गौ रक्षा आन्दोलन जैसे राष्ट्र जागरण के विभिन्न अभियानों में
उनका आशीर्वाद सदा रहा ही है। विश्व मंगल गौ ग्राम यात्रा के समय तो मुझे भी
उनके विचार सुनने का सौभाग्य मिला । तब मैंने देश, समाज, राष्ट्र और अपने धर्म के
प्रति उनका गहरा अनुराग अनुभव किया । सच ही वे गुरु जलन्धर नाथ की
श्रेष्ठ-गुरु-परम्परा के सच्चे उत्तराधिकारी एवं महायोगी थे। इस क्षेत्र की जनता के
तो वास्तव में ‘‘नाथ’’ ही थे। उनके ब्रह्मलीन होने से समस्त मरूधरा में एक अपूरित
सूनापन आ गया लगता है।
उनकी पावन स्मृति में प्रकाशित इस भाव पुस्तिका ‘‘सबके नाथजी’’ में
महाराज जी की जीवनी एवं साथ ही में शिव मानस पूजा, शिव पंचाक्षर स्त्रोतम्,
द्वादश ज्योतिर्लिंग स्त्रोतम व शिवाष्टकम्, लिंगाष्टकम्, रूद्राष्टकम्, बिल्वाष्टकम्
सहित शिव साधना के अन्यान्य विविध मंत्रों एवं स्त्रोतमों का समावेश पुस्तक को एक
पवित्र ग्रंथ की पहचान दिलाते दिखाई पड़ते है। पूज्य संत शांतिनाथ जी महाराज को
जालोर के श्रद्धालुओं द्वारा भावांजली स्वरूप समर्पित इस पावन पुस्तक की भूमिका
लिखने का सौभाग्य पाकर मैं स्वयं को धन्य मानकर परमात्मा की इस अनुपम कृपा
हेतु उनका ऋणी हूँ।
पुस्तक के सम्पादक श्री संदीप जी, सह सम्पादिका आदरणीया नीलम दीदी
और प्रकाशक-संस्कृति शोध परिषद्, जालोर को इस वंदनीय प्रयास के लिए
साधुवाद देता हूँ। पुस्तक के यशस्वी प्रकाशन के लिये शुभकामनाएँ ।
स्रोत: “सबके नाथजी” पुस्तक, संस्कृति शोध परिषद्, जालोर। पुस्तक क्रमांक 3।
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