॥ जय श्री शांतिनाथजी महाराज ॥
।। भक्तों की भावांजलि ।।
निर्मल पावन भावना, सबके सुख की कामना.....
- श्री तखतसिंह, पहाडपुरा
प. पू. श्री गुरुदेव श्री शांतिनाथजी महाराज की असीम कृपा से मुझे उनका
उत्तम एवं पवित्र सानिध्य लम्बे समय तक मिला। सौभाग्य से, अंतिम समय में भी
महाप्रयाण तक उनके चरणों उपस्थित रहा । सन 1986 में हरिद्वार महाकुंभ में प.पू.
शांतिनाथजी महाराज एवं संत मण्डली के साथ हरिद्वार कुंभ में जाने का मौका
मिला। सात-आठ दिन का प्रवास रहा । संजोग से एक दिन दूसरी बार स्नान करने
सप्त सरोवर क्षेत्र में गये । मुझे तैरना नहीं आता था फिसलन से मेरा पांव पिसल गया
और मैं बहती गंगाजी में डूब गया। उस समय बावसी हमारे साथ नहीं थे । श्री
कमलनाथजी, कैलाशनाथजी, पारसमलजी एवं गोल महंत जी रावतभारतीजी उस
समय हमारे साथ थे। उस घटना क्रम में एक अनजान महात्माजी ने मुझे बहती नदी
से निकाल कर जीवन दान दिया। अनजान महात्माजी ने अपना परिचय नहीं दिया
इतना ही कहा कि तुम्हारा जीवन था और मैंने बचा दिया ।
घटना पश्चात जब हम कैम्प मैं पहुंचे तब घटना से बावसी को अवगत
कराया। जब मुझे पूछा कि कहाँ गये थे, तब मैंने यथास्थिति वृतान्त बावसी को
निवेदन किया ।
बावसी की कृपा से ही मुझे जीवन दान मिला । उनके स्नेह व मार्गदर्शन से
धार्मिक कार्यों में प्रवर्त होने का मौका मिला ।
काम धन्धे के लिए बम्बई गया । लेकिन उनकी आज्ञा से बम्बई प्रवास
छोड़कर गांव में खेती बाडी से जीविका उपार्जन एवं सामाजिक एवं धार्मिक
्रगतिविधियों में प्रवृत्त रहने की प्रेरणा मिली । उनकी कृपा, स्नेह एवं उपकार का वर्णन
मैं शब्दों में नहीं कर सकता । उनका व्यक्तित्व सरल, कुशल, प्रबन्धक, दुरदर्शी
दृष्टिकोण से ओतप्रोत था।
उनकी आज्ञा अनुरुप जीवन जीऊँ उनके श्री चरणों में मेरी यही विनती है।
सद्बुद्धि एवं सद्भावना दें। सौभाग्य से जालोर क्षेत्र में ऐसे महापुरुष का प्रार्दुभाव
हुआ जिससे सभी को मानवीय मूल्यों से जीने की प्रेरणा मिली ।
।। जय नाथजी री सा ।।
स्रोत: “सबके नाथजी” पुस्तक, संस्कृति शोध परिषद्, जालोर। पुस्तक क्रमांक 36।
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