॥ जय श्री शांतिनाथजी महाराज ॥
।। भक्तों की भावांजलि ।।
हे ! ऋषिवर शत्-शत वंदन.....
- श्री महेश व्यास, जालोर
मैं अपने सौभाग्य की जितनी भी सराहना करूँ वह कमतर ही है क्योंकि विगत
कुछ वर्षों से मुझे परम पूजनीय श्रद्धेय गुरुवर पीरजी श्री शान्तिनाथजी महाराज के
जीवन के विविध पहलुओं को काफी करीब से जानने का मौका विभिन्न अवसरों पर
प्राप्त हुआ और यह सभी छूए-अनछूए क्षण मेरे जीवन स्मृति कोष का अक्षुण्ण एवं मेरा
कीमती खजाना है। ऐसा ही एक वाकया मेरे साथ पुस्तक ‘‘ गुरु वंदना’’ को लिपिबद्ध
करते समय घटित हुआ ।
‘‘ गुरु वंदना’’ पुस्तक प्रकाशन और लेखन को लेकर जब मेरे मन में विचार
उत्पन्न हुआ तो मैंने इसे अपने निकटजनों के साथ बाँटा। इस पर उन सभी के
अलग-अलग और मिले-जुले उत्साहित व हतोत्साहित करने वाले विचार एक-एक
कर मेरे सामने आने लगे। किसी का कहना था कि नाथजी महाराज प्रसार-प्रचार से
सदैव कौसो दूर ही रहते हैं, सो वह तुम्हें अनुमति देंगे यह संदेहात्मक ही है, तो कोई
कहता कि तुम कहीं नाथजी के क्रोध का कारण ना बन जाओ। परन्तु मेरा मन जहाँ
शंकाओं से घिरा था वहीं उसमें एक अनजाना विश्वास भी छलछला रहा था कि
नाथजी के शुभ आशीष व सहर्ष आज्ञा का आवरण मेरे इस पावन प्रयास के अनजाने
पथ पर मेरा न केवल मार्गदर्शन करेगा अपितु अमोघ रक्षा कवच का कार्य भी करेगा ।
और हुआ भी वही जो मैं मन ही मन चाहता था।
मैं कशमकश से भरा जब दोपहर की चिलचिलाती धूप में सिरे-मंदिर की
सीढ़ियाँ चढ़कर नाथजी के समक्ष उनके दरबार में उनके प्रत्यक्ष जा पहुँचा जहाँ वे
अपनी चिरपरिचीत मुद्रा में लेटे हुए थे । वहीं उनके आसपास कुछ अनुयायी बैठे थे।
मुझे इस तरह असमय आया देखकर उन्होंने मुस्कराते हुए आने का कारण
पूछा । मैंने डरते हुए उन्हें अपने प्रयोजन के सम्बन्ध में निवेदन किया तो वे मुस्कराये
और मुझे सहर्ष ही न केवल अनुमति दे दी बल्कि यह कर कर मेरा उत्साह और भी
बढाया कि तुम्हें यदि किसी भी तरह के सहयोग की आवश्यकता हो तो मुझे नि:संकोच
कहना। मैंने भी हामी में केवल सिर हिला दिया।
अब पुस्तक पर पूर्ण उत्साह व समर्पण से कार्य आरम्भ हुआ । कुछ ही माह के
प्रयासों से उसका मूर्तरूप हाथों में आ गया । मैं उसका कच्चा प्रारूप लेकर पुन:
नाथजी के समक्ष उपस्थित हो गया । उन्होंने बड़े ही गौर से पुस्तक के प्रत्येक पृष्ठ
को देखा । मुझे पुस्तक पढ़कर सुनाने का आदेश दे डाला ।
मैंने भी सहर्ष उनके आदेश की अनुपालना की। आप बीच-बीच में जगह-जगह पर
रोक रोककर संशोधन भी करवाते रहे। यह क्रम कई दिनों तक इसी प्रकार बार-बार
लगातार दोहराया गया । अन्तत: मुझे इसकी सैम्पल प्रतियाँ प्रकाशित करने की
अनुमति मिल गयी । मैंने भी उनके आदेशानुसार कुछ प्रतियाँ केवल नमूने के तौर पर
प्रकाशित करवा दी । और छपी छपाई नमूने की प्रतियाँ लेकर मैं पुन: नाथजी के समक्ष
जा पहुँचा। उन्होंने पुस्तक की नमूना प्रति लेकर अपने शिष्य श्री तखतसिंह
(पहाडपुरा) को देकर कहा कि गौर से देखो और अपनी राय से मुझे अवगत करवाओं।
श्री तखतसिंहजी ने गुरु आज्ञा के अनुरूप बडे़ गौर से पुस्तक को पढ़ा और कुछ
आवश्यक सलाह भी दी जिन्हें मैंने मूल अंक में सम्मिलित करने की बात कही और
उनके प्रति धन्यवाद किया । मैंने उन सभी बातों का प्रारूप में संशोधित व सम्मिलित
कर ली और कुछ दिनों पश्चात मैं पुन: प्रारूप लेकर आपके समक्ष पहुँचा । जिसे
आपने मुस्काते हुए वर्तमान गादीपति एवं पीठाधीश पीर गंगानाथजी महाराज के हाथों
में सौंप कर उन्हें गौर से देखने को कहा।
श्री गंगानाथजी महाराज ने भी पूर्ण मनोयोग से पुस्तक को पढ़ा और बिना
किसी संशोधन के प्रति को लौटाते हुए उत्साह वर्धन करते हुए पुस्तक की सराहना भी
कर दी । परन्तु गुरुदेव नाथजी काफी समय तक केवल मौन रहकर मुस्कारते ही रहे।
फिर प्रति को मेरी ओर बढाते हुए एक स्नेह की झिडकी देते हुए बोले कि आजकल
लोग मेहनत से बचते हैं । मुझे तुमसे ऐसी अपेक्षा नहीं थी और इसी लिए मैंने तुम्हारे
इस कार्य को स्वीकृति दी थी। तुम इस पुस्तक को और अधिक सुन्दर एवं सर्वोपयोगी
बना सकते हो तो ऐसा क्यों नही कर रहे हो? फिर मुझे स्नेह से थपथापते हुए बोले कि
समय लगे उसकी परवाह मत करो पर इस पुस्तक को पुष्प बनाओं जो पढ़ने वाले को
भी अपनी महक से सुवासित कर दे । मेरा आशीर्वाद सदैव तुम्हारे संग है। इतना
सुनते ही पुस्तक के बारे में सभी की सराहना ओर प्रशंसा से उत्पन्न मेरे मन का गर्व
क्षण भर में ही पता नहीं कहाँ उड़न छू हो गया और मैं आसमान से सीधे जमीन पर आ
गया ।
वो दिन था और आज का दिन है । गुरुवर जरूर हमारे बीच सशरीर नहीं है
परन्तु उनकी मात्र उसी आज्ञा को शिरोधार्य कर मैं विगत समय से पुस्तक ‘‘ गुरू
वंदना’’ को नाथजी की इच्छा के अनुरूप परिष्कृत एवं संशोधित स्वरूप प्रदान करने
के ध्येय को लेकर अनवरत प्रयासरत हूँ और नाथजी मेरे हर कदम पर मार्गदर्शक एवं
प्रेरणा बनते हैं।
स्रोत: “सबके नाथजी” पुस्तक, संस्कृति शोध परिषद्, जालोर। पुस्तक क्रमांक 46।
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