॥ जय श्री शांतिनाथजी महाराज ॥
मन के अनर्तद्वंद समाप्त हो जाते थे।
परम पूज्य नारायणगिरीजी महाराज
पीठाधीश, दुदेश्वर मठ, गाजीयाबाद, दिल्ली
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, भारत साधु समाज
नवनाथों की सिद्धपीठ श्री जालंधर नाथ सिद्धपीठ, सिरे मंदिर, जालोर की
ख्याति राजस्थान में ही नहीं सम्पूर्ण भारत में फैली है। आध्यात्मिकता से परिपूर्ण इस
स्थान पर नाथों के द्वारा सदैव भक्तों के कष्टों का निवारण होता रहता है । जनमानस
के हृदय सम्राट पीर शांतिनाथजी वास्तव में एक सिद्ध योगी थे। वे सज्जनता व
सरलता की प्रतिमूर्ति थे। सभी श्रद्धालुओं के प्रति उनके मन में प्रेम था । चाहे वे किसी
भी धर्म के हो या किसी भी जाति के हो। सभी धर्मों के प्रति उनमें समभाव था । गीता
में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते है - हे पुरुष श्रेष्ठ ! जो पुरुष सुख तथा दु:ख में
विचलित नहीं होता और इन दोनों में समभाव रहता है, वह निश्चित रूप से मुक्ति के
योग्य है।
जबकि श्री शांतिनाथ जी भौतिक रूप से इस नश्वर संसार में नहीं है, परन्तु
सूक्ष्म रुप से जनमानस के हृदय में आज भी निवास करते है । आपका जैसा नाम था
वैसा ही आपके व्यक्तित्व का प्रभाव था। श्रद्धालु आपके दर्शन मात्र से ही परम शान्ति
का अनुभव करते थे । मैं जब संन्यास की भावना से अपना घर तेलवाड़ा छोडकर चला
तो आज से लगभग 35 वर्ष पूर्व सर्वप्रथम मेरी भेंट पीर शांतिनाथ जी से हुई थी। वे
वास्तव में अलौकिक सिद्ध पुरूष थे । जब मैंने उन्हें प्रणाम किया तो वे मेरी ओर कुछ
देर तक अपलक घूरकर देखते रहे, उनकी दृष्टि में ना जाने क्या था कि मुझे अपने पूरे
शरीर में विद्युत की तंरगे सी दौड़ती हुई महसूस हो रही थी। लगा जैसे योग का
शक्तिपात हुआ हो। कुछ देर तक मैं स्तंभित सा खडा रहा । अचानक उनकी वाणी मेरे
कानों में सुनाई दी । कटारो है छोरा ? ने कठाथी से आयो है तो मेरी तन्द्रा टुटी, मुझे
सामान्य होने में कुछ समय लगा। मैने कहा-तेलवाड़ा गांव रहूँ हूँ, छूटते ही उन्होंने
कहा-जठे गोगाजी रो मेलो लागे है, जी-बावसी-मैंने कहा, इसके बाद मैं 3-4
दिन तक वहां उनके पास रहा ।
इसके बाद मेरा संन्यास हुआ । उज्जैन-कुम्भ में श्री शांतिनाथ जी भी पधारे।
उन्हें मेरी याद उस समय भी बनी हुई थी । उन्होंने पूरे जूना-अखाड़े में मुझे तलाश
करवाया और जब हम आपस में मिले तो उनकी आँखे नम थी। मैंने आगे बढकर
उनकी आंखें पाैंछकर हृदय से लगा लिया। काफी देर तक हम ऐसे ही लिपटे रहे। ये
मिलन का दृश्य ऐसा था जैसे राम का भरत से मिलन । पूरे कुम्भ में वे मेरे साथ ही
रहे। मेरे प्रति उनका विशेष लगाव था । कुम्भ की समाप्ति के पश्चात ऊँकारेश्वर के
दर्शन करने भी हम साथ ही गये। वापसी में साथ के लोगों को अचानक बड़ी जोर से
भूख लगने लगी। लेकिन रास्ते में कोई व्यवस्था नहीं थी। तभी मेरी नजर सामने एक
बोर्ड पर पडी जिस पर चैखी-ढाणी लिखा था। सब कुछ जानते समझते हुए भी
मुझसे पूछा-ओ चोखी-ढाणी कोई वे ? तब मैने कहा आ, रबारियों री ढाणी है, तब
उन्होंने सबसे कहा कि यहीं पर भोजन करेंगे। इस प्रकार महाराज जी का सभी
जातियों के प्रति प्रेम प्रकट होता है। वे जात-पांत, छुआ-छूत को नहीं मानते थे, तभी
तो वो सबके नाथ कहलाते थे।
कुछ वर्षों के बाद जब मैं अपनी कुटुम्ब यात्रा करने के लिये तेलवाड़ा गया तब
जालोर से श्री महाराज जी भी मेरे साथ मेरे गांव गये, गांव में पहुँच कर अचानक
उन्होंने मुझ से कहा कि-आज तो माताजी के हाथ का बना भोजन करना है। तब हम
घर पंहुचे और माँ के हाथ का भोजन किया । भोजन करने के बाद महाराज जी
बोले-आज कई वर्षों के बाद माँ के हाथ का भोजन कर मन को तृप्ति मिली है। ऐसा
लग रहा था जैसे माँ के रूप में साक्षात माता अन्नपूर्णा ही भोजन करा रही हों । इसके
बाद मैें जब भी जालोर जाता था, मैं उनके दर्शन करने अवश्य जाया करता था। उनके
दर्शन करने से ही मेरे मन के सारे अंतदर्वद्व स्वयं ही समाप्त हो जाते थे । पीर शांतिनाथ जी
वास्तव में दिव्य व अलौकिक संत थे। वे अब जबकि भौतिक रूप से इस संसार में नहीं
है, परन्तु उनकी कृपा अभी भी मेरे साथ है, ऐसा मेरा अनुभव है। गीता में भी भगवान
श्रीकृष्ण कहते है-‘‘ हे कुन्तीपुत्र, शरीर-त्यागते समय मनुष्य जिस-जिस भाव का
स्मरण करता है, वह उस-उस भव को निश्चित रूप से प्राप्त होता है। जो श्रेष्ठ पुरुष
होते है, जो योगी या सिद्ध पुरुष होते है, उनकी आत्मा-रूपान्तरण के पश्चात श्रेष्ठ
राजकुल, गुरुकुल, अथवा श्रेष्ठ सन्त-कुल में जाती है। मैं तो समझता हूॅ कि उनके
दिव्य तेज का कुछ अंश मुझे भी मिला है, ऐसी प्रत्यक्ष अनुभूति मुझे हुई हैं।
अब जबकि पीर जी का भौतिक शरीर वहां पर नहीं है तो मेरा मन भी उस
पवित्र भूमि की ओर जाने के लिये पूर्व की भांति आंदोलित नहीं होता है । कारण चाहे
जो भी हो, उस परमसत्ता को ज्ञात है । महायोगी शांतिनाथ जी को सम्पूर्ण भक्तजन,
महान-संत, सिद्ध-योगी और शिव-स्वरूप मानकर पूजते हैं। मेरा मानना है कि अब
वे भौतिक शरीर को छोडकर शिव-मय हो गये है सबके नाथ बन गये है।
स्रोत: “सबके नाथजी” पुस्तक, संस्कृति शोध परिषद्, जालोर। पुस्तक क्रमांक 18।
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