॥ जय श्री शांतिनाथजी महाराज ॥
।। श्री नाथजी महिमा ।।
मादाभारती गोस्वामी
आलासन
वीर प्रसविनी वीरम वीर की जालोरी धरती को पीरजी ने अपने तप से धन्य किया है-
संयम -शील-शीतल-वृति, दिव्य-ज्ञान-ज्योति ।
गुण-गरिमा जिनकी अपार-महिमा प्रखर योग विभूति।
राठौड़-कुल-भूषण, सकल दोष-दूषण धर्म-ध्वनि ।
धन्य अखण्ड-ज्योत शान्ति नाथ धन्य जालोर अवनि ।
अनाथों के नाथ थे पीरजी -
अपूर्व महिमा जिनकी पुण्य प्रतिभा प्रखरतम योगिराज हैै।
त्यागी - तपसी - वीतरागी, धर्मानुरागी भेष सिरताज है।
उत्कृष्टतम चरित्र जिनका सुखद श्री शान्तिनाथ नाम हैं।
ऐसे गुरुवर पीर‘‘ अनाथ के नाथ’’ चरणे कोटि प्रणाम है।
सनातन धर्म के सजग प्रहरी एवं तीर्थों के उद्धारक थे पीरजी -
सत्य सनातन धर्म के सजग प्रहरी ।
दिव्य गुणों के आप अनुपम धाम हैं।
विश्वकर्मा अवतारी तीर्थ उद्धारी ।
कर्म-योगी, ब्रह्म-भोगी शत-शत- प्रणाम है।
संसार के प्रति पीरजी की नश्वरता -
रे ! चिर प्रवासी मनवा ठौर ठिकाना नहीं है अपना।
आया सोहि जायेगा धु्रव सत्य है जगत एक सपना ।
है कौन तेरा विश्व में ध्यान देकर एक बार देख ले।
पीर भी महाप्रयाण कर गये जरा मुसाफिर सोच ले ।
सेवा, सहजता एवं करूणा के पुजारी थे पीरजी -
सहज-सरल-सरस करुणावान प्रेम-पुजारी ।
संतसेवी भक्तभावी युग पुरूष अवतारी ।
युग-युग में जग-मग हो गुरू आप अवतारी ।
मरूधरा नाथ पर भक्त वार-वार बलिहारी ।
पंथ वाद और सम्प्रदाय से ऊपर उठकर मानव सेवा के समर्थक थे नाथजी
वाह रे ! गुरु वाह ! पीरजी आप धर्म बतायो मानव सेवा ।
पंथ-पंथ में बंदा उल्टा फंसिया, सेवा रो फल मुक्ति सेवा ।
हिन्दू-मुस्लिम, सिक्ख-ईसाई, जैन-बौद्धी एक पुरुष परिवारा ।
अण समझण में करे तर्क विवादा, सब धारा री है एक धारा ।
उपेक्षितों के प्रति पीरजी की अनूठी सहानुभूति थी -
‘‘ जिसका कोई नहीं’’ ऐसे अनाथों को नाथजी ने अपनाया है।
आजा बेटा इधर, संबोधन से सत्य का मार्ग बताया है।
धनवान, बलवान, पदवान का प्रभाव पीर को न लुभाया है।
उपेक्षित को प्रेम से बुलाकर नाथ ने दिलासा दिलाया है।
श्राद्ध पक्ष प्रतिपदा तिथि दक्षिणायन रात्रि को गले गलाया है।
मेवाड़ क्षेत्र की वीर भौम में आपने समाधि-ध्यान लगाया हैं।
अपने भक्तो और शिष्यो को हरि नाम सिमरण के लिए दिव्य संदेश अपनी वाणी में
दिया है -
धारो वीर नेम धर्म री, धर्म सू तिर जाई जो रे ।
दया राख जो दिलड़ा में, प्रेम पंथ अपनाईजो रे ।
पहली पहली नेम वीरा ब्रह्म समय में जगणा रे ।
स्नान ध्यान नित नेम करना, भगवान को भज लेना रे ।
दूजी-दूजी नेम वीरा, पंछियों ने दानों डालों रे।
गौऊ ग्रास और कीड़ी-कुतों रो भाग झटके टालो रे ।
अंत में मैं गुरु देव के लिए एक पुष्प अर्पित करना चाहूँगा जो गोस्वामी तुलसीदासजी
ने रामचरित में गुरू महिमा के रूप में वर्णन किया ।
बंदऊ गुरु पद पदुम परागा ।
सुरूचि सुवास सरस अनुराग ।।
।। जय श्री नाथजी ।।
स्रोत: “सबके नाथजी” पुस्तक, संस्कृति शोध परिषद्, जालोर। पुस्तक क्रमांक 31।
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