॥ जय श्री शांतिनाथजी महाराज ॥
भेष के सिरताज-नाथजी महाराज
परम पूज्य रणछोडभारतीजी महाराज
पीपलेश्वर मठ, भैसवाडा-लेटा
पीरजी महाराज भेरव सभा के सिरताज थे। आपके बिना भेरव सभा आधी
अधूरी लगती थी। आपकी उपस्थिति से किसी भी धार्मिक कार्य क्रम में चार चांद लग
जाते थे। शान्तिनाथजी महाराज सच्चे योगी थे जिनके पास हमें स्वत: आध्यात्मिक
योग की ऊर्जा प्राप्त होती थी।
आप भेरव धारी संत महात्मा चाहे वह किसी सम्प्रदाय या धर्म का सदस्य हो
उनको बड़े आदर के साथ देखते थे। जितनी उनकी सेवा हो सकती थी आप करवाते
थे। भोजन पं्रगत करवाकर आवश्यकतानुसार उनको भेंट पूजा, वस्त्र, जलपात्र आदि
देकर विदा करते थे।
पीरजी का भेरव-सभा, जन-सभा या कोई भी धार्मिक क्रिया कलाप में
अंकुश एवं अनुशासन स्वभाविक था। प्रतिष्ठा भंडारा, यज्ञ या किसी भी विशाल
भक्ति कार्यक्रम में सम्मिलित होने पर हमें उनसे प्रबंधन की दूरदर्शिता एवं
व्यवस्थापन का उचित मार्गदर्शन मिलता था। उनके पास हमारे लिए गहरी
आत्मीयता थी जिसके कारण हमें उनके समीप बैठकर लंबे समय तक वार्तालाप
करने पर भी अपनत्व प्रतीत होता था। उनके पास से हमारा उठने का मन नहीं होता
था। वे आवश्यक कार्य या भगवत चर्चा या भेष की मर्यादा की ही बात करते थे। आप
के निकट पहुंचने पर तथा आप से मिलने पर हमें शान्ति एवं शीतलता का अनुभव
होता था। पीरजी हम जैसे महात्माओं के लिए एक अग्रज गुरु भाई की तरह व्यवहार
करते थे। मुझे जब आप के कैलाश वास होने का दु:खद समाचार मिला तो गहरा
दु:ख प्रतीत हुआ । जो मेरे लिए असहनीय था । भगवान शिव ने ही ऐसी शक्ति दी
जिससे इस दु:ख को सहन कर सके। अन्यथा मुझ जैसे भावुक व्यक्ति के लिए बहुत
कठिन बात थी ।
नाथजी महाराज इस समय चल रही भेष की मर्यादा के लिए बहुत चिंतन एवं
मनन करते थे, इस भेष भगवान रूपी अक्षय पूँजी का भविष्य कैसा होगा? इस बात
पर महात्माओं को मार्गदर्शन और निर्देशन देते थे। वर्तमान युग में भेष की मर्यादा का
निर्वहन करना (निभाना) बहुत ही विकट मार्ग है। पीरजी सच्चे कर्मयोगी थे।
‘‘ वे तन जोगी न होकर मन जोगी’’ थे। जिनका अन्त:करण गंगा के समान पवित्र
था। आपको बाहरी दिखावा एवं प्रदर्शन कतई पसन्द नहीं था। आपका अभाव हमारे
भेष मण्डल और भक्त मण्डल में सदैव महसूस होता रहेगा। इतना ही नहीं ऐसा दिव्य
विभूति का जालोर में अवतरित होना इस क्षेत्र के लिए गौरव की बात है। जिन्होंने
जालोर क्षेत्र को आध्यात्मिक एवं धर्म क्षेत्र में अपने सेवा संकल्पों द्वारा राष्ट्रीय मंच पर
सकारात्मक रूप से प्रस्तुत कर इस वीरम वीर की धरती को धन्य किया है :-
‘‘ धन्य है जालोरी धरती, वन्दनीय है दिव्य विभूति ।
शान्तिनाथजी जैसे पीर ने की है जहाँ ईश भक्ति ।।
अंत में मैं अपना मंतव्य एक दोहे के द्वारा गुरू मूर्तियों को प्रति श्रद्धा सुमन के
रूप प्रस्तुत करना चाहूँगा जो पीरजी महाराज में गुरु तत्व के रूप मे विद्यमान था।
गुरू कुम्हार, शिष्य कुम्भ है, गढि-गढि काढे खोट।
अंदर सहारा देत है, बाहिर मारे चोट ।।
।। ऊँ नम: शिवाय ।।
स्रोत: “सबके नाथजी” पुस्तक, संस्कृति शोध परिषद्, जालोर। पुस्तक क्रमांक 15।
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