🚩 सिरे मंदिर जालोर • जय श्री नाथजी महाराज री हुक्म 🚩

नाथ सम्प्रदाय: एक विहंगम दृष्टि - पूज्य निरंजननाथजी

॥ जय श्री शांतिनाथजी महाराज ॥

नाथ सम्प्रदाय - विहंगम दृष्टि

परम पूज्य निरजंन नाथजी महाराज
।। योग की महत्ता एवं नाथ ।। गोरखनाथ आश्रम, कोटा
सृष्टि के आदि काल से लेकर आज तक के साक्षात्कारी ऋषियों, महर्षियों,
संतों, मुनियों, आचार्यो और दार्शनिकों ने प्राय: एक-मत से योगविद्या को ही
आत्मोन्नति का सर्वोपकारक कारक माना हैं। वैदिक और अवैदिक धर्म तथा
सम्प्रदाय इसी विद्या को मुख्यत: प्रतिपादित करते रहे हैं। ज्ञान, कर्म और उपासना
आदि पद्धतियां भी इस योग चेतना से इतनी प्रभावित हुई हैं कि इस साधना के
इतिहास में भी ये ज्ञान योग, कर्म योग, तथा उपासना योग में परिणत हो गयी ।
वस्तुत: इस योग विद्या के द्वारा मानव का अत:करण निर्मल, शांत और स्थिर होता है,
जिसके सामथर्य से वह आत्मा का रहस्य समझने में समर्थ हो जाता है। अत: इस
सत्य को नकारा नहीं जा सकता है कि ‘‘ नास्ति योग समं बलं’’ । यह योग विद्या
प्राणी-मात्र का सार्वभौम धर्म है जो कि आत्मतत्व का साक्षात्कार कराता हुआ मन
और अन्त:करण को सुसंस्कृत करता हैं।
नाथ सम्प्रदाय सम्बंधित योग के विभिन्न पहलुओं पर ध्यान देने से यह स्पष्ट
होता है कि यह सम्प्रदाय भारतीय साधना के पटल पर एक प्रकाश स्तम्भ की भाँति
अपनी योग युक्तियों का विमल आलोक प्रसारित करता है। इस सम्प्रदाय के अंतर्गत
साधना के क्षेत्र में मुख्य रूप से ये तथ्य उभर कर सामने आये है-गुरु महिमा, वैराग्य,
इन्दि्रय-निग्रह, प्राणनिग्रह, मनोनिग्रह, कुण्डलिनी जागरण, षट्चक्रभेद, अजपाजाप,
अनाहतनाद, शून्य तत्व, शिव शक्ति, पिंड ब्रह्माण्ड, एवं घट परिचय तथा निष्पति के
द्वारा नाथ स्वरूपावस्थान।
अत: इसमें लशे,ा मात्र भी सदंहे नहीं है कि नाथ सम्पद्राय के द्वारा अनमुाेिदत
याग े -साधना‘‘ क्षरुस्य धारा निशिता दरुत्यया’’ हाके र भी श्रषे,ठतम कल्याणकारक मार्ग
हैं, जिस मार्ग पर चलता हअ ुा साधक अपने जीवन के चरम लक्ष्य को पा्रप्त कर सकता
ह।ै इसलिए शास्त्रों में यागे -यकु,त जीवन की ही श्रषे,ठता पि,रतपादित की गयी ह- ै
वेदेषु यज्ञेषु तप:सु चैव, दानेषु यत्पुण्य फलम प्रदिष्टम्।
अत्येति तत्सर्वमिदम विदित्वा,योगी परमं स्थानमुपैति चाद्यम्।।
।। 8-28 श्री गीता जी ।।
-यागे तत्व को जानने वाला यागेी परुुष वदे, यज्ञ, तप आरै दान आदि का जो फल कहा
गया है, उन सब को निसदंहे उल्लघां,न कर जाता है आरै सनातन परम पद को पा्रप्त हातेा ह।ैं

।। अवैदिक नहीं है नाथ मत।।
महंत आदित्यनाथ जी महाराज ने कहा है कि नाथ मत अवैदिक नहीं है। उनका
कहना है कि नाथपंथियों का साधना-दर्शन परवर्ती उपनिषदों से सम्बद्ध है। नाथों में
तांत्रिक तत्व मिलते हैं तथा वेद और तंत्र बहुत भिन्न नहीं है। नाथों की साधना
पद्धति तथा दर्शन से अधिकाँश तत्व वेदों से सम्बद्ध किये जा सकते हैं।
नाथ मत में दया, संतोष, अहिंसा, दान, जीव-दया, आदि कर्म और गुणों का परिचय
मिलता है। नाथों की दृष्टि में योग का मूल तत्व है दया और दान ।
।। गुरु से बड़ा कोई नहीं ।।
नाथों की साधना का आरम्भ गुरु तत्व से होता है । योग
साधक को अनेकानेक रहस्यमय, अपरिचित तथा कठिन मार्ग पर चलना पड़ता है,
जिनमें आंशिक असावधानी तथा अज्ञान से रुग्ण होने अथवा प्राणहानि होने तक की
आशंका रहती हैं।
नाथों की साधना पद्धति में पिंड के समरसीकरण को स्वीकार किया गया है।
यह परमपद में समरसीकरण गुरु की कृपा से होता है। वहीं पिंडपद और परमपद का
ज्ञान कराता है। केवल शास्त्र-ज्ञान या महापोह से इनका ज्ञान नहीं होता है। इस
परमपद को स्वयंवेद्य कहा गया है। गुरु चरणों में रत रहने से इस स्वयंवेद्य परमपद
की सिद्धि सम्भव बताई गयी है। केवल इसी साधना से योगियों को स्वपिंड के
निरुत्थान का अनुभव होता है। तत्पश्चात समरसीकरण की सिद्धि होती हैं।
नाथों की साधना पद्धति में पिंड व ब्रह्माण्ड के एकत्व का सिद्धांत
मान्य है। नाथों की साधना पद्धति में समरसीकरण के लिए ‘योग रहित ज्ञान’ और’
ज्ञान रहित योग’ की निरर्थकता बताते हुए योग युक्त को ही मोक्षोपाय के रूप में
स्वीकार किया गया हैं। शौच, उदर-क्रिया, स्वभावज्ञान, अभ्यास, आसन, वैराग्य,
अनाहार, प्राण-धारण, मुद्रा, काया-क्लेश, जप, तप, ध्यान, तीर्थ-सेवन, देवार्चन,
भक्ति, आश्रमपालन, षड्दर्शन, केश-धारण, मुंडन आदि दैहिक साधनों से परम पद
की प्राप्ति कदापि नहीं होता । सिद्ध पुरुष अदैहिक साधनों का आश्रयण कर परम
पद की प्राप्ति सिद्ध करते हैं। अदैहिक साधनों में स्थिति गुरु की कृपा से प्राप्त होती
है, इस लिए गुरु से बड़ा कोई नहीें ।
।। नाथ पंथ का प्रारम्भ ।।
शोधकर्ता गण नाथ मत का उदय गुरु गोरखनाथ जी महाराज के जन्म काल
13 वीं शताब्दी से 17 वीं शताब्दी तक से मानते हैं। जब कि नाथ मान्यता के अनुसार
गोरख नाथ जी महाराज का तो जन्म हुआ ही नहीं । वे तो अजन्मा हैं । वे स्वयं शिव
है । योगी है। जन्म-मृत्यु से परे है। इसका प्रमाण है कि गुरु गोरखनाथ जी महाराज
से सम्बंधित अनेक स्थान भारत भर में हैं, किन्तु उनकी समाधि कहीं नहीं है, अत:

आया है सो जाएगा राजा रंक फकीर’’ का सिद्धांत गोरख नाथ जी महाराज पर लागू
नहीं होता है। क्योंकि वे आये ही नहीं तो जायेंगे क्या ? सदा विद्यमान रहने वाले
परमात्म तत्व की व्याख्या भौतिक प्रकार से नहीं की जा सकती ।
जिन लेखकों या शोधकर्ताओं ने योग-सिद्धि और अमरता का ज्ञान
प्राप्त नहीं किया है, वे व्यर्थ ही काल निर्धारण के चक्कर में रह कर अपने समय को
नष्ट करते रहते हैं। आत्म-योग को योग दृष्टि से ही जाना जा सकता है। योगियों
के चमत्कार की भौतिक व्याख्या भी असम्भव है। अमर-काय या सिद्ध-काय होने का
विश्वास तो भौतिक नेत्र या भौतिक विज्ञान से किया ही नहीं जा सकता ।
नाथ पंथ अनादि काल से है । जब से शिव हैं तब से योग मार्ग है और जब से योग
मार्ग है तब से गुरु गोरख नाथ जी महाराज हैं। भगवान शिव के अनेक रुप हैं। उन
में तीन प्रमुख हैं- जगत का कल्याण करने वाला रूप ‘‘ शिव रूप’’ काल नियंत्रण
करने वाला रूप ‘‘ महाकाल’’ और योग प्रवर्तन करने वाला रूप ‘‘ गुरु गोरक्ष
नाथ’’।।
अत: श्री गुरु गोरक्षनाथ जी महाराज अजन्मा है। आप अमर-काय है
और योग-मार्ग से अमर-काय होने की अद्भूत पद्धति आपने विकसित की । मर
कर मोक्ष प्राप्त करने के सिद्धांत के विपरीत आपने जीवित ही अमर होने का उपाय
जन जन को बताया ।
श्री गुरु गोरखनाथ जी महाराज हठयोग के आचार्य हैं। शिवावतार व शिवगोरक्ष नाम
से आप को अभिमंडित किया जाता है। नौ नाथ, चैरासी सिद्धों में आपको प्रमुख
माना जाता हैं। आप नाथ साहित्य के आरम्भकर्ता माने जाते हैं। आपकी, गुरु
गोरखनाथ जी की लिखी गद्य-पद्य की चालीस रचनाओं का परिचय मिलता है।
।। युग-युगीन है अनादि नाथ पंथ ।।
जब-जब आवश्कता हुई तब तब श्री गुरु गोरक्षनाथ जी महाराज धरा
धाम पर प्रकट हुए । चारों युगों में आप की अवस्थिति मानी जाती है। सत्य युग में
भगवान शिव के कहने से योग-मार्ग पर प्रचार करने के लिए भगवान महाविष्णु ने
मत्स्येन्द्रनाथ का रुप धारण किया और उनको सहयोग देने के लिए श्री शिव उनके
शिष्य के रुप में गोरक्षनाथ नाम धारण कर पृथ्वी पर आये । इन दोनों को ही
बोल-चाल की भाषा में मछन्दरनाथ और गोरखनाथ कहा जाता हैं
माता पार्वती को भगवान शिव ने अमर कथा सुनायी और हुंकारा मत्स्य के द्वारा
निगले हुए एक बालक ने दिया । ज्ञात होने पर श्री शिव भगवान ने उस बालक को
मत्स्य से मुक्त कराया और उसका नाम मत्स्येन्द्र नाथ रखा और विष्णु के अवतार उस
बालक को योग प्रचार के लिए दीक्षित किया । फिर योग प्रचार के मार्ग में कठिनाई
आने पर उन गुरु मछन्दर नाथ जी महाराज ने भगवान शिव से सहायता की प्रार्थना

की तो भगवान शिव गोरखनाथ जी रुप में प्रकट हुए प्रकट रुप में मछन्दर नाथ जी
महाराज से योग दीक्षा प्राप्त की । यह कथा सत्य युग की हैं।
त्रेता युग में राम रावण युद्ध के पश्चात श्री राम को आयी ग्लानि को
गुरु गोरक्ष नाथ जी महाराज ने उन्हें योग दीक्षा देकर दूर किया। श्री राम जी के
साथ श्री लक्ष्मण जी एवं श्री हनुमान जी को भी आपने योग मार्ग में दीक्षित किया ।
नाथ पंथ में इन तीनों के नाम से अलग पंथ भी चलते हैं।
द्वापर युग में श्रीकृष्ण-रूक्मिणी विवाह में बाधा के निवारण के लिए
श्री गुरु गोरक्ष नाथ जी महाराज आये थे। कल्पद्रुम तंत्र में वह पूरी कथा दी हुई है।
श्री कृष्ण के कुलगुरु श्री गर्ग ऋषि ने भी अपने ग्रन्थ में यह कथा दी है।
कलियुग तो अभी ताजा ताजा है। इसकी तो अनेक घटनाएं, कथाएं
उपलब्ध है। पिछली दो सहस्त्राब्दियों में धर्म पर लगातार कई प्रकार से आघात होते
रहे, इसलिए नाथ गुरुओं और सिद्धों ने बार-बार जागरण किया और विभिन्न प्रकार
से योग, धर्म, चरित्र, स्वास्थ्य, राष्ट्र आदि की रक्षा की और पीडित मानवता की सेवा
का अलख जगाया । जन-विश्वास और जन-सामथर्य को बनाये रखने के लिए
स्थान-स्थान पर आस्था एवं संघटन के केन्द्र के रूप में मठ, मंदिर, आसन आदि
स्थापित किये ।
पुराणों में उल्लिखित यह कथा भी यहाँ देना समुचित है कि ‘‘ नव नारायण’’ ही धरती
पर’’ ‘‘नव नाथ’’ बन कर आये और केवल अपना कल्याण ही करने की अपेक्षा
जन-कल्याण करने का महत्व प्रतिपादित किया ।
।। नाथ पंथों की एकता ।।
नाथ सम्प्रदाय में अनेक पंथ है तो भी नाथ मत पूरा एक ही है। अनेक
पंथ है, अनेक सिद्ध‘‘ प्रयोग बहुत प्रसिद्ध है। भेष-धारियों के बारह-अठारह के महंत
होते हैं। अर्थात इतने पंथ तो हैं ही इस प्रकार अनेक पंथ है, तो भी ये केवल इसलिए
है कि जिन जिन महापुरुषों अथवा महायोगियों का इस सम्प्रदाय के विस्तार-प्रसाद
में योगदान रहा है, उनके प्रति वह पन्थानुयायी गौरवान्वित अनुभव करे और उनसे
प्रेरणा प्राप्त करता हुआ अपने योग पथ पर अविचल बना रहे। सब पंथों में अद्भूत
एकता है। इनमें पारस्परिक रूप से कोई भेद नहीं है। इसी का परिणाम है कि देश में
सामाजिक, पारिवारिक एकता को संरक्षण करने में नाथ पंथ अद्भूत रूप से सफल
हुआ हैं।
।। हठयोग ।।
हठयोग में हठ शब्द दो अक्षरों ‘‘ह’’ और ‘‘ठ’’ अक्षरों से बना है। जिस
में ‘‘ह’’ का अर्थ सूर्य नाड़ी पिंगला और ‘‘ठ’’ का अर्थ चन्द्र नाडी इडा होता है। शरीर
के भीतर कार्य करने वाली सभी प्राण शक्तियां, प्राण, समान, उदान और ध्यान, इडा
और पिंगला के सुचारु क्रिया-शीलता और श्वास क्रिया की नियमित व्यवस्था

पर अवलम्बित है। शरीर के भीतर होने वाली प्राय: सभी महत्व पूर्ण क्रियाएँ
सामान्यत: हमारे नियंत्रण या इच्छा से नहीं, स्वत: होती है । इन सभी को अपनी
इच्छा-शक्ति और विवेक से संयमित करना ही हठयोग का लक्ष्य है। अन्त:चेतना की
उच्चतम स्थिति में शिव और शक्ति की एकता स्थापित करना हठयोग की साधना का
अंतिम लक्ष्य है षंडग योग से हठयोगी कुदरत को चुनौती देकर कुदरत के सारे
नियमों से मुक्त हो जाता है और और अदृश्य कुदरत है, उसे भी लाँघकर परम शुद्ध
प्रकाश हो जाता है।
विद्वानों का कथन है कि सिद्धों की भोग-साधना की प्रतिक्रिया के
रुप में आदिकाल में नाथपंथियों की हठयोग साधना आरम्भ हुई । अनेक साधक जो
भोग-प्रधान साधना से मुक्ति चाहते थे वे नाथ-पंथियों की हठयोग से प्रभावित होकर
नाथ मत में सम्मिलित हो गए । शैव एवं शाक्तों के अतिरिक्त बौद्ध, जैन तथा वैष्णव
योग मार्गी भी नाथ सम्प्रदाय में आ मिले। इस प्रकार नाथ मत का सर्व समावेशक
स्वरुप प्रकट हुआ ।
गुरु गोरक्षनाथ जी महाराज कुशल संघटनकर्ता रहे हैं उन्होंने इन
सम्प्रदाय के बिखराव और इस सम्प्रदाय की योग विद्याओं का एकत्रीकरण किया।
इनकी प्रभाविता के कारण ही अन्य सम्प्रदायों के अनेक योग साधक सिद्ध भी नाथ
पंथ में सम्मिलित हुए ।
।। नाथ मत का विस्तार ।।
दर्शनी और औघड़ नाथ साधुगण ग्राम नगर पहाड़ जंगल आदि सभी
प्रकार के भूभाग पर साधना करते रहे है और आज भी कर रहे है। नाथ मत के
प्रचार-प्रसार में स्वाभाविक ही उनका योगदान होता रहता है।
सारे भारत में नाथ साधुओं के चमत्कार, कथाएं, जनश्रुतियां, आसन, मठ, अखाडे
आदि भरे पड़े है। वर्तमान भारत के बाहर वृहतर भारत, तिब्बत, नेपाल, बर्मा, सिंध,
बंगला देश, बलूचिस्तान, अफगानिस्तान, अरब, ईरान में भी नाथ मत का प्रभाव
प्राचीन काल से रहा है। चीन, जापान, आदि में भी नांथों का प्राचीन प्रभाव है।
आजकल संसार के अन्य अनेक देशों में नाथ सम्प्रदाय के योग मत का प्रसार हो
गया है। भारत और नेपाल के नाथ गुरुओं से दीक्षा लेकर अनेक सिद्ध लोग संसार
के अनेक देशों में योग एवं नाथ मत का प्रसार कर रहे हैं। उत्तरी अमेरिका, दक्षिणी
अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका, एशिया, आदि महाद्वीपों के अनेक देशों में नाथ सम्प्रदाय
अपना प्रभाव स्थापित कर चुका है।
।। नाथ सम्प्रदाय का योगदान ।।
बीच के काल में भारत पर अनेक प्रकार के आक्रमण हुए । उन से
भारत की रक्षा करने का महान कार्य नाथ सम्प्रदाय ने किया ।

1. मुसलमानों के आक्रमण से देश को बचाने के लिए गोरक्षनाथ जी
महाराज ने वीर गोगा जी महाराज को प्रेरित किया, उन्होंने गोगा जी को समझाया
कि महमूद गजनवी सोमनाथ पर आक्रमण करने जा रहा है, इसे यह नहीं मानना
चाहिए कि सोमनाथ मात्र गुजरात का है, उन्होंने कहा कि सोमनाथ के शिव जी और
ददरेवा के शिव जी अलग-अलग नहीं है। उनकी इस प्रेरणा से गोगा राणा ने गोगा
मेडी से लेकर सौराष्ट्र तक फैले नाथानुयायियों को संघटित किया, उनके द्वारा
महमूद के मार्ग में स्थान-स्थान पर अवरोध खड़े किये और अंतत: लूट का माल
लेकर उसे गजनी नहीं जाने दिया । इतिहास में राष्ट्र-रक्षा के इस महा-योगदान
का समावेश होना आवश्यक है।
इसी प्रकार चितौड़ को विदेशी मुसलमान आक्रमणकारियों से मुक्त
कराने के लिए एक सिद्ध खड्ग बप्पा रावल को प्रदान की बप्पा रावल ने
काबुल-कंधार तक के देश को म्लेच्छों से मुक्त कराया ।
महाराणा प्रताप ने ‘दिवेर’ का युद्ध रूपनाथ जी महाराज के आशीर्वाद
से जीता। विजया दशमी के दिन जीता गया वह युद्ध नाथ जी कृपा से महाराणा
प्रताप का विजय अभियान सिद्ध हुआ। अंतत: अकबर ने मेवाड़ की ओर मुंह करने से
तौबा कर ली। ऐसे अनेक इतिहास साक्ष्यों पर शोध करने की आवश्यकता है।
2. मुसलमानों के संसर्ग में आने से हिन्दू समाज में भेद-भाव,
ऊँच-नीच, अनाचार, दुराचार, आदि रोग का गए । नाथों के प्रभाव से हिन्दू समाज
में एकता का संचार हुआ, समाज शत्रुओं के हत्थे चढने से बच गया और सदाचार पर
अडिग रहने की प्रेरणा कर हिन्दू समाज सबलता को प्राप्त हुआ ।
3. मुसलमानों से जन-जीवन को बचाये रखने के प्रयास में हिन्दू
समाज अशिक्षा का शिकार हो गया तो स्थानीय भाषाओं में रचनाएं प्रस्तुत कर जन
जीवन को धर्म से जोड़े रखा और समाज को टुटने, बिखरने और सीमित होने से
बचाया ।
4. आचरण की शुद्धता को बनाये रखने के लिए और विदेशी अशुद्ध संस्कार
से बचाव के लिए समुद्र पार न जाने का नियम बनाया गया था। नाथ पंथ ने योग-
बल और आत्म-बल की शिक्षा से संस्कारों को सुदृढ किया संस्कारों पर सुदृढ रहने
का बल प्रदान किया और फिर देश के बाहर भी नाथ मत का प्रचार प्रसार किया ।
इसीलिये आज विश्व के अनेक देशों में प्रकारांतर से हिन्दुत्व का प्रकाश फैल रहा है।
5. मार्ग प्राप्ति के लिए लोग इधर उधर भटकते रहते हैं। संतोष नहीं
होता है। किन्तु कहावत प्रसिद्ध हो गयी है कि ‘‘ सब घर भटके, नाथ घर अटके’’।
इसका अर्थ है कि नाथ पंथ ने लोगों को विधर्म में जाने से बचाया । इस प्रकार
जन-संख्या हृास से हिन्दू समाज का बचाया। इसी प्रकार विदेशियों में नाथ पंथ का

प्रसार कर हिन्दू समाज को बढ़ाया । इन दिनों ईसाई मिशनरी अपने प्रकार से भारत
पर आक्रमण करने में लगे हुए हैं तो नाथ मतावलम्बी अपने प्रकार से प्रत्याक्रमण
करने में लगे हुए हैं।
6. देश के अनेक सम्प्रदायों में हीनाचरण के कारण विभिन्न मत के
योगियों में दुराचार फैल गया था, नाथ पंथ के संतों सिद्धों ने भ्रष्ट हो रहे योग मार्ग
को आचरण शुद्धि पर बल देकर शुद्ध किया और सच्चरित्र रहने का कठिनतम
उदाहरण समाज में प्रस्तुत किया ।
।। नाथ जी की माया, कोई समझ नहीं पाया ।।
गुरु किस को क्या देता, गुरु किस से क्या कराता है और कब कराता
है, इन प्रश्नों का उतर इस पर निर्भर करता है कि गुरु शिष्य में क्या योग्यता देखता
है और देश काल परिस्थिति की क्या आवश्यकता गुरु को प्रतीत होती है। यह सच्चे
गुरु का कार्य है। किन्तु ऊपर ऊपर से देखने वाले को यह बात विचित्र लगती है
इसीलिए वह बोल देता है - ‘‘ नाथ जी की माया, कोई समझ नहीं पाया’ ।
गोरखनाथ जी महाराज ने राजा भर्तृहरि को राजा से रंक बना दिया और ग्वाले बप्पा
रावल को रंक से राजा बना दिया। यह किस को समझ में आ सकता हैं? राजस्थान
में अनेक राज-कुल नाथ गुरुओं की कृपा से पुष्पित-पल्लवित हुए। नेपाल में तो पूरा
समाज ही नाथ जी कृपा से गोरक्ष कहलाने लग गया ।
जन-साधारण से लेकर राज कुल तक नाथ जी का प्रसार है। यह किस को
समझ मे आ सकता है? किसी एक पहाड़ी में जालंधर नाथ जी महाराज प्रकट हो गए
और आयस जी को बोला कि उस व्यक्ति को बोल देना कि यह जोधपुर का राजा
होने वाला है और सचमुच वैसा हो गया । यह किस को समझ में आ सकता है ? और
यह कोई समझ जाए कि वह योगी गुरुओं की दिव्य दृष्टि का चमत्कार है। परन्तु
जालंधर नाथ जी महाराज तो जाने कब हुऐ थे और अभी कुछ सौ साल पहले कहाँ
से प्रकट हो गए ? यह किस को समझ में आ सकता हैं ?
भर्तृहरि जी महाराज की समाधि अलवर के पास है । भर्तृहरि जी तो अमरकाय थे, वे
मरे ही नहीं, तब उनकी समाधि कहाँ से आयी? यह किस को समझ में आ सकता हैं?
नेपाल के राजगुरु पूजनीय नरहरि नाथ जी महाराज तो अभी कुछ वर्षों पहले तक
जीवित थे। नेपाल सरकार ने उन पर डाक टिकट निकाला है। वे एक स्थान से
दूसरे पर उड कर चले जाते थे। यह भी कोई प्रदर्शन के लिए नहीं, अपितु अपनी
दैनिक आवश्यकता के लिए । जैसे जंगल दशा अर्थात जंगल में शौच जाने के लिए
वे पद मार्ग से जाने मे समय व्यय नहीं करते थे तो आकाश मार्ग से चले जाया करते
थे । ‘‘ उड़न बाबा’’ जी के नाम से वे प्रसिद्ध है। पर ऐसा हो सकता है ? यह किस
को समझ में आ सकता है?
सच है - नाथ जी की माया नाथ जी ही जाने या हम प्रार्थना करें कि जो योग मार्ग
नाथ जी का अवदान है संसार को, वह हमें भी प्राप्त हो, हे प्रभु ।। ऊँ ।।


स्रोत: “सबके नाथजी” पुस्तक, संस्कृति शोध परिषद्, जालोर। पुस्तक क्रमांक 6।

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